तो क्या क्यूरेटिव पिटीशन से निर्भया केस के दोषियों की सज़ा में हो सकता है बदलाव?
Tuesday - January 14, 2020 2:07 pm ,
Category : WTN HINDI
निर्भया केस के दोषियों ने लगाई है सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन
अपने ही किसी फ़ैसले के तथ्यों पर सुनवाई है क्यूरेटिव पिटीशन
JAN 14 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले निर्भया गैंगरेप मर्डर केस में पटियाला हाऊस कोर्ट ने चारों दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वॉरन्ट जारी कर दिया है। डेथ वॉरन्ट के मुताबिक़, 22 जनवरी को सुबह 7 बजे चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। लेकिन इस सबके बीच आपने सुना और पढ़ा होगा कि दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन लगाई है। क्यूरेटिव पिटीशन के बारे में सुनकर और पढ़कर कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर क्यूरेटिव पिटीशन होती क्या है, और क्या क्यूरेटिव पिटीशन लगाने से निर्भया के दोषी फांसी की सज़ा से बच सकते हैं या उनकी फांसी की सज़ा टल सकती है? आइये इस बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन को न्यायिक व्यवस्था में न्याय पाने के लिए सबसे आख़िरी उपाय के तौर पर जाना जाता है। क्यूरेटिव पिटीशन के ज़रिये ही किसी केस में अनसुनी रह गई किसी बात या तथ्य को कोर्ट काफ़ी गम्भीरता से सुनता है। दरअसल, यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई एक व्यवस्था है, जो उसकी ही शक्तियों के ख़िलाफ़ काम करती है। बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन में कोर्ट के पूरे फ़ैसले पर चर्चा नहीं होती है, बल्कि इसमें सिर्फ़ कुछ बिन्दुओं पर ही दोबारा से विचार किया जाता है।
फांसी की सजा पाये किसी व्यक्ति के लिए मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के लिए क्यूरेटिव पिटीशन को सबसे अन्तिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए ही निर्भया केस के दोषी अपनी फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के लिए क्यूरेटिव पिटीशन को सबसे आख़िरी उपाय के तौर पर अपना रहे हैं। निर्भया केस के दोषियों की क्यूरेटिव पिटीशन के ज़रिये यह मांग होगी कि उनकी फांसी की सजा को उम्रक़ैद में बदल दिया जाये।
दरअसल, क्यूरेटिव पिटीशन लगाने वाले दोषी अपनी सज़ा की प्रकृति बदलने या सज़ा को कम कराने के लिए कई तरह की दलील देते हैं। उदाहरण के तौर पर निर्भया केस में क्यूरेटिव पिटीशन डालने वाले एक दोषी विनय शर्मा की ओर से यह कहा गया है कि कोर्ट को उसकी फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद करने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि घटना के समय उसकी उम्र सिर्फ़ 19 साल की थी।
विनय के वकील का तर्क है कि उस अवस्था में विनय की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि पर विचार करने के बाद कोर्ट को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। विनय शर्मा की तरफ़ से क्यूरेटिव पिटीशन में यह दलील पेश की गई है कि दुष्कर्म और हत्या से जुड़े 17 दूसरे मामलों में फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदला गया है। इसी तरह से उसे भी फांसी की सजा के बजाय उम्रक़ैद की सज़ा दी जानी चाहिये।
वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन और रिव्यू पिटीशन में भी अन्तर होता है। बता दें कि रिव्यू पिटीशन में कोर्ट अपने पूरे फ़ैसले पर पुनर्विचार करती है, जबकि क्यूरेटिव पिटीशन में कोर्ट अपने द्वारा दिये गये फ़ैसले के कुछ बिंदुओं पर विचार करती है। यदि कोर्ट को ऐसा लगता है कि किसी केस से सम्बन्धित किसी मुद्दे या किसी बिंदु पर दोबारा से विचार करने की ज़रूरत है तो क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान उस पर विचार होता है। सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान अगर सुनवाई होती है, और फांसी के दिन तक इस पर फ़ैसला नहीं आता है तो फांसी की तारीख़ टल सकती है।
अब आप सोच रहे होंगे कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में क्यूरेटिव पिटीशन की व्यवस्था कैसे आई। तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन को न्याय पाने के आख़िरी उपाय के तौर पर देखा जाता है, और यह अधिकार देश के हर नागरिक को मिला है। जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के एक मामले से सामने आई थी। दरअसल, इस मामले में कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि क्या सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन ख़ारिज हो जाने के बाद भी कोई उपाय है, जिसके माध्यम से दोषी व्यक्ति कोर्ट के सामने मामले पर एक बार और विचार करने का आग्रह कर सके।
इस तरह का सवाल उठने के बाद इस पर कोर्ट का कहना था कि न्यायिक व्यवस्था में किसी के साथ भी पक्षपात नहीं होना चाहिए, और कोर्ट की यही पूरी कोशिश रहती है। वहीं यदि कोर्ट को अगर लगता है कि उसके ही किसी निर्णय के कारण किसी के साथ भी किसी भी तरह का पक्षपात हो रहा है तो वो इसके कुछ बिंदुओं पर दोबारा से विचार कर सकती है। कोर्ट की इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद भारतीय न्यायिक व्यवस्था में क्यूरेटिव पिटीशन की व्यवस्था सामने आई।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिव्यू पिटीशन ख़ारिज हो जाने के बाद ही क्यूरेटिव पिटीशन आख़िर उपाय होता है। कोर्ट में आमतौर पर हर मामले में क्यूरेटिव पिटीशन नहीं डाली जाती है। बहुत ही कम मामलों में ही क्यूरेटिव पिटीशन को सुनने के लिए कोर्ट राज़ी होता है। बता दें कि यदि कोर्ट को लगता है कि प्राकृतिक न्याय में किसी भी तरह की अनदेखी हुई है तभी कोर्ट क्यूरेटिव पिटीशन सुनने पर राज़ी होती है।
JAN 14 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले निर्भया गैंगरेप मर्डर केस में पटियाला हाऊस कोर्ट ने चारों दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वॉरन्ट जारी कर दिया है। डेथ वॉरन्ट के मुताबिक़, 22 जनवरी को सुबह 7 बजे चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। लेकिन इस सबके बीच आपने सुना और पढ़ा होगा कि दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन लगाई है। क्यूरेटिव पिटीशन के बारे में सुनकर और पढ़कर कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर क्यूरेटिव पिटीशन होती क्या है, और क्या क्यूरेटिव पिटीशन लगाने से निर्भया के दोषी फांसी की सज़ा से बच सकते हैं या उनकी फांसी की सज़ा टल सकती है? आइये इस बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन को न्यायिक व्यवस्था में न्याय पाने के लिए सबसे आख़िरी उपाय के तौर पर जाना जाता है। क्यूरेटिव पिटीशन के ज़रिये ही किसी केस में अनसुनी रह गई किसी बात या तथ्य को कोर्ट काफ़ी गम्भीरता से सुनता है। दरअसल, यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई एक व्यवस्था है, जो उसकी ही शक्तियों के ख़िलाफ़ काम करती है। बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन में कोर्ट के पूरे फ़ैसले पर चर्चा नहीं होती है, बल्कि इसमें सिर्फ़ कुछ बिन्दुओं पर ही दोबारा से विचार किया जाता है।
फांसी की सजा पाये किसी व्यक्ति के लिए मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के लिए क्यूरेटिव पिटीशन को सबसे अन्तिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए ही निर्भया केस के दोषी अपनी फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के लिए क्यूरेटिव पिटीशन को सबसे आख़िरी उपाय के तौर पर अपना रहे हैं। निर्भया केस के दोषियों की क्यूरेटिव पिटीशन के ज़रिये यह मांग होगी कि उनकी फांसी की सजा को उम्रक़ैद में बदल दिया जाये।
दरअसल, क्यूरेटिव पिटीशन लगाने वाले दोषी अपनी सज़ा की प्रकृति बदलने या सज़ा को कम कराने के लिए कई तरह की दलील देते हैं। उदाहरण के तौर पर निर्भया केस में क्यूरेटिव पिटीशन डालने वाले एक दोषी विनय शर्मा की ओर से यह कहा गया है कि कोर्ट को उसकी फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद करने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि घटना के समय उसकी उम्र सिर्फ़ 19 साल की थी।
विनय के वकील का तर्क है कि उस अवस्था में विनय की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि पर विचार करने के बाद कोर्ट को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। विनय शर्मा की तरफ़ से क्यूरेटिव पिटीशन में यह दलील पेश की गई है कि दुष्कर्म और हत्या से जुड़े 17 दूसरे मामलों में फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदला गया है। इसी तरह से उसे भी फांसी की सजा के बजाय उम्रक़ैद की सज़ा दी जानी चाहिये।
वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन और रिव्यू पिटीशन में भी अन्तर होता है। बता दें कि रिव्यू पिटीशन में कोर्ट अपने पूरे फ़ैसले पर पुनर्विचार करती है, जबकि क्यूरेटिव पिटीशन में कोर्ट अपने द्वारा दिये गये फ़ैसले के कुछ बिंदुओं पर विचार करती है। यदि कोर्ट को ऐसा लगता है कि किसी केस से सम्बन्धित किसी मुद्दे या किसी बिंदु पर दोबारा से विचार करने की ज़रूरत है तो क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान उस पर विचार होता है। सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान अगर सुनवाई होती है, और फांसी के दिन तक इस पर फ़ैसला नहीं आता है तो फांसी की तारीख़ टल सकती है।
अब आप सोच रहे होंगे कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में क्यूरेटिव पिटीशन की व्यवस्था कैसे आई। तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन को न्याय पाने के आख़िरी उपाय के तौर पर देखा जाता है, और यह अधिकार देश के हर नागरिक को मिला है। जानकारी के लिए बता दें कि क्यूरेटिव पिटीशन रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के एक मामले से सामने आई थी। दरअसल, इस मामले में कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि क्या सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन ख़ारिज हो जाने के बाद भी कोई उपाय है, जिसके माध्यम से दोषी व्यक्ति कोर्ट के सामने मामले पर एक बार और विचार करने का आग्रह कर सके।
इस तरह का सवाल उठने के बाद इस पर कोर्ट का कहना था कि न्यायिक व्यवस्था में किसी के साथ भी पक्षपात नहीं होना चाहिए, और कोर्ट की यही पूरी कोशिश रहती है। वहीं यदि कोर्ट को अगर लगता है कि उसके ही किसी निर्णय के कारण किसी के साथ भी किसी भी तरह का पक्षपात हो रहा है तो वो इसके कुछ बिंदुओं पर दोबारा से विचार कर सकती है। कोर्ट की इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद भारतीय न्यायिक व्यवस्था में क्यूरेटिव पिटीशन की व्यवस्था सामने आई।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिव्यू पिटीशन ख़ारिज हो जाने के बाद ही क्यूरेटिव पिटीशन आख़िर उपाय होता है। कोर्ट में आमतौर पर हर मामले में क्यूरेटिव पिटीशन नहीं डाली जाती है। बहुत ही कम मामलों में ही क्यूरेटिव पिटीशन को सुनने के लिए कोर्ट राज़ी होता है। बता दें कि यदि कोर्ट को लगता है कि प्राकृतिक न्याय में किसी भी तरह की अनदेखी हुई है तभी कोर्ट क्यूरेटिव पिटीशन सुनने पर राज़ी होती है।