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आर्थिक सुस्ती के बाद अब महंगाई बनी आम इंसान के लिए ‘चुनौती’

Wednesday - January 15, 2020 10:45 am , Category : WTN HINDI
सब्ज़ियों के दाम ने बढ़ायी लोगों की चिन्ता
सब्ज़ियों के दाम ने बढ़ायी लोगों की चिन्ता

महंगी सब्ज़ियों ने बढ़ाई महंगाई दर, सितम्बर 2020 के बाद ही राहत मिलने की ‘उम्मीद’
 

JAN 15 (WTN) – महंगाई एक ऐसी समस्या है जिसका सामना एक विकासशील देश के लोगों को हर समय करना ही पड़ता है। ख़ासतौर से ईंधन यानी कच्चा तेल आयात करने वाले देशों में महंगाई पूरी तरह से कच्चे तेल की क़ीमतों पर ही निर्भर रहती है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की आशंका के कारण कई दिनों से कच्चे तेल की क़ीमतों में वृद्धि देखी जा रही है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है तो इससे कच्चे तेल की क़ीमतों में भारी तेज़ी होगी, और इस कारण से भारत में महंगाई में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारी बारिश के कारण इस साल प्याज़ समेत कई सब्जियों के दामों में काफ़ी तेज़ी गई है, और सब्ज़ियों के दाम में वृद्धि के कारण महंगाई दर में इज़ाफ़ा हो रहा है। भारतीय स्टेट बैंक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़, सब्ज़ियों के दामों में हुई वृद्धि को देखते हुए जनवरी महीने के CPI (Consumer Price Index) यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 8 प्रतिशत से ज़्यादा जा सकती है। यानी इस महीने में भी आपको महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि सोमवार को जारी खुदरा महंगाई दर दिसम्बर 2019 में उछलकर 94 महीनों के उच्च स्तर 7.35 प्रतिशत पहुंच गयी। जबकि इससे पहले नवम्बर के महीने में यह 5.54 प्रतिशत थी।

लेकिन आपके लिये राहत की बात यह है कि जनवरी महीने के बाद सब्ज़ियों के दाम में यदि गिरावट आती है तो मुद्रास्फीति की दर थोड़ी कम हो सकती है। हालांकि, एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है कि मार्च तक खुदरा महंगाई दर 7 प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है। अब जबकि एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कह दिया है कि मुद्रास्फीति की दर 7 प्रतिशत या उससे ज़्यादा बनी रह सकती है, तो ऐसे में भारतीय रिज़र्व बैंक को अपनी मौद्रिक नीति में ब्याज दरें मौजूदा स्तर पर ही बरक़रार रखनी पड़ सकती हैं।

दरअसल, मुद्रास्फीति बढ़ने के कई कारण होते हैं जिसमें सब्ज़ियों का महंगा होना भी एक कारण है। बता दें कि एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर में कमी नहीं आती है तो आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था अवरुद्धतामय स्फीति (स्टैगफ्लेशन) की स्थिति में आ सकती है। अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर अवरुद्धतामय स्फीति (स्टैगफ्लेशन) क्या होती है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जब आर्थिक वृद्धि दर कमज़ोर रहती है और उस कारण से महंगाई दर ऊंची रहती है तो इसे ही अवरुद्धतामय स्फीति (स्टैगफ्लेशन) कहते हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, महंगाई दर में वृद्धि का मुख्य कारण प्याज़, आलू और अदरक की क़ीमतों में तेज़ी है। इतना ही नहीं, मोबाइल नेटवर्क कम्पनियों द्वारा अपना टैरिफ बढ़ाये जाने से भी मुद्रास्फीति पर 0.16 प्रतिशत का असर पड़ा है। इन्हीं सब कारणों के अध्ययन के बाद कहा जा रहा है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति इस महीने 8 प्रतिशत से ज़्यादा हो सकती है। हालांकि, आशा की जा रही है कि इसके बाद इसमें कुछ सुधार हो सकता है।

अब जबकि महंगाई दर में वृद्धि देखी जा रही है, ऐसे में रिज़र्व बैंक मुद्रास्फीति और वृद्धि के अनुमानों पर एक बार फ़िर से विचार करने के लिए बाध्य हो सकता है। इधर एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रिज़र्व बैंक के पास दिसम्बर के महीने में अपनी मौद्रिक नीति के अंतर्गत नीतिगत दर में कटौती का अच्छा अवसर था, लेकिन रिज़र्व बैंक ने ऐसा करना शायद उचित नहीं समझा।

अब आप सोच रहे होंगे कि क्या इसी तरह से महंगाई का दौर चलता रहेगा? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सितम्बर 2020 के बाद ही महंगाई में नरमी की उम्मीद की जा रही है। अनुमान है कि दिसम्बर 2020 से जनवरी 2021 तक की समयावधि में सकल मुद्रास्फीति घटकर 3 प्रतिशत के नीचे जा सकती है। यानी रिज़र्व बैंक 2020 में अपनी मौद्रिक नीति में शायद ही कोई बदलाव करे। बता दें कि मौद्रिक नीति पर विचार करते समय आरबीआई मुख्य रूप से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर पर विचार करता है।

यानी साफ़ है कि आने वाले समय में भी आपको तब तक महंगाई से निजात मिलना मुश्किल है जब तक कि सब्ज़ियों के दाम नियंत्रण में नहीं आते हैं। वहीं खाड़ी में तनाव बढ़ने या फ़िर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होने की स्थिति में कच्चे तेल की क़ीमतों में वृद्धि हुई तो इससे महंगाई और भी ज़्यादा बढ़ सकती है। वैसे फ़िलहाल महंगाई से डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि सब्ज़ियों के दाम फसलों के ख़राब होने से बढ़े हैं। लेकिन यदि जल्द ही आर्थिक सुस्ती से निजात नहीं मिली और महंगाई बढ़ती रही तो यह ज़रूर चिन्ता का कारण बन सकता है।