आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार के लिए आई एक बड़ी ‘राहत’ की ख़बर
Tuesday - February 4, 2020 10:53 am ,
Category : WTN HINDI
धीरे-धीरे कम हो रहा है आर्थिक सुस्ती का असर
आख़िरकार PMI आंकड़ों ने दी मोदी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर मुस्कुराने की वजह!
FEB 04 (WTN) – पिछले क़रीब 18 महीनों से वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी ना किसी कारण से काफ़ी प्रभावित किया है। ऑटो सेक्टर से लेकर टैक्सटाइल सेक्टर तक, अर्थव्यवस्था के लगभग हर सेक्टर पर वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने अपना नकारात्मक असर डाला है। वैश्विक आर्थिक सुस्ती के लिए वैस तो कई कारण जिम्मेदार रहे हैं, लेकिन अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर एक बहुत बड़ा फैक्टर था। जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था की बात है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आर्थिक सुस्ती ने देश की जीडीपी के साथ ही कई लोगों के रोज़गार पर असर डाला है। यानी सार यही है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को किसी ना किसी तरह से प्रभावित किया है।
लेकिन आख़िरकार आर्थिक सुस्ती से निजात मिलने के संकेत मिलने लगे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नए साल के पहले महीने के उत्पादन के आंकड़े बता रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था पर छाई आर्थिक सुस्ती अब ख़त्म हो रही है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, नए ऑर्डर्स मिलने के कारण भारत में मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी इस साल जनवरी के महीने में पिछले आठ साल की तुलना में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ी है। बता दें कि निक्केई मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स (Nikkei PMI) इंडेक्स IHS मार्केट दिसम्बर में जो कि 52.7 था वो जनवरी के महीने में बढ़कर 55.3 पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक़, यह फरवरी 2012 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है, जबकि साल भर पहले जनवरी 2019 में यह आंकड़ा 53.9 अंक था।
आपकी जानकारी के लइए बता दें कि PMI (Purchasing Managers' Index), मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की आर्थिक स्थिति को सही तरीक़े से बताने वाले एक इण्डिकेटर है। इस इण्डेक्स के ज़रिए किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन लगाया जाता है। मैन्युफैक्चरिंग के अलावा, सर्विस सेक्टर के लिए भी पीएमआई आंकड़े जारी होते हैं।
वैसे आशा की जा रही थी कि अमेरिका और चीन के बीच हुई ट्रेड डील के बाद आर्थिक सुस्ती का असर कम होगा, और ऐसा हुआ भी। आंकड़ों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि बाज़ार में मांग बढ़ने लगी है, और इसी कारण से आर्थिक सुस्ती का असर धीरे-धीरे काम होता जा रहा है। ज़ाहिर है कि देश की मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बढ़ी हैं, तो इसका मतलब है कि इससे उत्पादन बढ़ रहा है, और रोजगार गतिविधियों में भी पहले की तुलना में बेहतरी दिखाई दे रही है। जानकारी के लिए बता दें कि यह लगातार 30 वां महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग PMI 50 अंक से ऊपर रहा है। दरअसल, PMI का 50 अंक से ऊपर रहना आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत है, जबकि PMI का 50 अंक से नीचे रहना आर्थिक गतिविधियों में कमी को बताता है।
साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गये उपाय अब धरातल पर दिखने लगे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ महीनों पहले मोदी सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी, जिससे आर्थिक सुस्ती से जूझ रही कम्पनियों को राहत और सहारा मिले। कॉरपोरेट टैक्स में कमी के अलावा, मोदी सरकार ने कई उपाय किए थे जिससे मांग बढ़े, और मांग बढ़ने से उत्पादन बढ़े। PMI के जो आंकड़े हैं वो साफ़ तौर पर बता रहे हैं कि आर्थिक सुस्ती से भारतीय अर्थव्यवस्ता उबर रही है, और ग्राहकों की ज़रूरत में सुधार हुआ है, जिसके कारण मांग बढ़ने से उत्पादन बढ़ रहा है। बता दें कि नए ऑर्डर मिलने में मैन्यूफैक्चरिंग में जो तेज़ी देखी जा रही है ऐसी तेज़ी पिछले 5 सालों में नहीं देखी गई है।
वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि PMI के आंकड़ों से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी आर्थिक सुस्ती का असर कम हो रहा है। दरअसल, जनवरी महीने के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कम्पनियों की कुल बिक्री में विदेशी बाज़ारों से बढ़ी मांग की अहम भूमिका है। इतना ही नहीं, विदेशी बाज़ार की यह मांग नवम्बर 2018 के बाद सबसे तेज़ गति से बढ़ी है। जैसा कि आप जानते हैं कि आर्थिक सुस्ती ने रोज़गार के क्षेत्र में भी काफ़ी बड़ा झटका दिया था, लेकिन जनवरी महीने में रोज़गार सम्बन्धित गतिविधियों में भी सुधार देखा गया है जो कि पिछले साढ़े सात साल में सबसे तेज़ है।
अर्थव्यवस्था के जानकारों के मुताबिक़, PMI आंकड़ों में आया सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है। स्वाभाविक है कि अर्थव्यवस्था में सुधार से रिज़र्व बैंक को भी राहत मिली होगी। ऐसे में अब देखना होगा कि बाज़ार की गतिविधियां देखकर रिज़र्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति में किस तरह के परिवर्तन करता है। जानकारों के मुताबिक़, आर्थिक सुस्ती से उबरने के इस दौर में रिज़र्व बैंक द्वारा ऐसे उपाय किए जा सकते हैं, जिसमें लोगों के पास ज़्यादा पैसा बचे, और वे इन पैसों का इस्तेमाल ख़रीदी में करें, जिससे कम्पनियों के लिए मैन्यफैक्चरिंग की मांग बढ़ती रहे। तो आख़िरकार मोदी सरकार के लिए PMI आंकड़ों ने आर्थिक मोर्चे पर मुस्कुराने का कारण दे ही दिया है। अब देखना होगा कि अर्थव्यवस्था में आई यह तेज़ी में और कितना उछाल आता है?
FEB 04 (WTN) – पिछले क़रीब 18 महीनों से वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी ना किसी कारण से काफ़ी प्रभावित किया है। ऑटो सेक्टर से लेकर टैक्सटाइल सेक्टर तक, अर्थव्यवस्था के लगभग हर सेक्टर पर वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने अपना नकारात्मक असर डाला है। वैश्विक आर्थिक सुस्ती के लिए वैस तो कई कारण जिम्मेदार रहे हैं, लेकिन अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर एक बहुत बड़ा फैक्टर था। जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था की बात है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आर्थिक सुस्ती ने देश की जीडीपी के साथ ही कई लोगों के रोज़गार पर असर डाला है। यानी सार यही है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को किसी ना किसी तरह से प्रभावित किया है।
लेकिन आख़िरकार आर्थिक सुस्ती से निजात मिलने के संकेत मिलने लगे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नए साल के पहले महीने के उत्पादन के आंकड़े बता रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था पर छाई आर्थिक सुस्ती अब ख़त्म हो रही है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, नए ऑर्डर्स मिलने के कारण भारत में मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी इस साल जनवरी के महीने में पिछले आठ साल की तुलना में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ी है। बता दें कि निक्केई मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स (Nikkei PMI) इंडेक्स IHS मार्केट दिसम्बर में जो कि 52.7 था वो जनवरी के महीने में बढ़कर 55.3 पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक़, यह फरवरी 2012 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है, जबकि साल भर पहले जनवरी 2019 में यह आंकड़ा 53.9 अंक था।
आपकी जानकारी के लइए बता दें कि PMI (Purchasing Managers' Index), मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की आर्थिक स्थिति को सही तरीक़े से बताने वाले एक इण्डिकेटर है। इस इण्डेक्स के ज़रिए किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन लगाया जाता है। मैन्युफैक्चरिंग के अलावा, सर्विस सेक्टर के लिए भी पीएमआई आंकड़े जारी होते हैं।
वैसे आशा की जा रही थी कि अमेरिका और चीन के बीच हुई ट्रेड डील के बाद आर्थिक सुस्ती का असर कम होगा, और ऐसा हुआ भी। आंकड़ों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि बाज़ार में मांग बढ़ने लगी है, और इसी कारण से आर्थिक सुस्ती का असर धीरे-धीरे काम होता जा रहा है। ज़ाहिर है कि देश की मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बढ़ी हैं, तो इसका मतलब है कि इससे उत्पादन बढ़ रहा है, और रोजगार गतिविधियों में भी पहले की तुलना में बेहतरी दिखाई दे रही है। जानकारी के लिए बता दें कि यह लगातार 30 वां महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग PMI 50 अंक से ऊपर रहा है। दरअसल, PMI का 50 अंक से ऊपर रहना आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत है, जबकि PMI का 50 अंक से नीचे रहना आर्थिक गतिविधियों में कमी को बताता है।
साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गये उपाय अब धरातल पर दिखने लगे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ महीनों पहले मोदी सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी, जिससे आर्थिक सुस्ती से जूझ रही कम्पनियों को राहत और सहारा मिले। कॉरपोरेट टैक्स में कमी के अलावा, मोदी सरकार ने कई उपाय किए थे जिससे मांग बढ़े, और मांग बढ़ने से उत्पादन बढ़े। PMI के जो आंकड़े हैं वो साफ़ तौर पर बता रहे हैं कि आर्थिक सुस्ती से भारतीय अर्थव्यवस्ता उबर रही है, और ग्राहकों की ज़रूरत में सुधार हुआ है, जिसके कारण मांग बढ़ने से उत्पादन बढ़ रहा है। बता दें कि नए ऑर्डर मिलने में मैन्यूफैक्चरिंग में जो तेज़ी देखी जा रही है ऐसी तेज़ी पिछले 5 सालों में नहीं देखी गई है।
वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि PMI के आंकड़ों से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी आर्थिक सुस्ती का असर कम हो रहा है। दरअसल, जनवरी महीने के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कम्पनियों की कुल बिक्री में विदेशी बाज़ारों से बढ़ी मांग की अहम भूमिका है। इतना ही नहीं, विदेशी बाज़ार की यह मांग नवम्बर 2018 के बाद सबसे तेज़ गति से बढ़ी है। जैसा कि आप जानते हैं कि आर्थिक सुस्ती ने रोज़गार के क्षेत्र में भी काफ़ी बड़ा झटका दिया था, लेकिन जनवरी महीने में रोज़गार सम्बन्धित गतिविधियों में भी सुधार देखा गया है जो कि पिछले साढ़े सात साल में सबसे तेज़ है।
अर्थव्यवस्था के जानकारों के मुताबिक़, PMI आंकड़ों में आया सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है। स्वाभाविक है कि अर्थव्यवस्था में सुधार से रिज़र्व बैंक को भी राहत मिली होगी। ऐसे में अब देखना होगा कि बाज़ार की गतिविधियां देखकर रिज़र्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति में किस तरह के परिवर्तन करता है। जानकारों के मुताबिक़, आर्थिक सुस्ती से उबरने के इस दौर में रिज़र्व बैंक द्वारा ऐसे उपाय किए जा सकते हैं, जिसमें लोगों के पास ज़्यादा पैसा बचे, और वे इन पैसों का इस्तेमाल ख़रीदी में करें, जिससे कम्पनियों के लिए मैन्यफैक्चरिंग की मांग बढ़ती रहे। तो आख़िरकार मोदी सरकार के लिए PMI आंकड़ों ने आर्थिक मोर्चे पर मुस्कुराने का कारण दे ही दिया है। अब देखना होगा कि अर्थव्यवस्था में आई यह तेज़ी में और कितना उछाल आता है?