बाल विवाह और मातृत्व मृत्युदर रोकने मोदी सरकार ले सकती है ‘बड़ा फ़ैसला’
Thursday - February 6, 2020 1:25 pm ,
Category : WTN HINDI
लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र हो सकती है 21 साल
लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र को बढ़ा सकती है मोदी सरकार
FEB 06 (WTN) – बाल विवाह और मातृत्व मृत्युदर अभी भी भारत में ज्वलंत समस्याएं हैं। बता दें कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए कड़े क़ानून होने, और मातृत्व मृत्युदर रोकने के लिए तमाम तरह की चिकित्सा सुविधाएं होने के बाद भी देश में बाल विवाह नहीं रूक रहे हैं। दरअसल, बाल विवाह ना रूकने के कारण लड़कियों की कम उम्र में शादी हो रही है, और कम उम में शादी होने के कारण मातृत्व मृत्यु दर भी कम नहीं हो रही है। वैसे नियम के मुताबिक़, 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी करना ग़ैर क़ानूनी है। लेकिन बाल विवाह रोकने के लिए कड़े क़ानून बनने के बाद बाल विवाह नहीं रुक रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि मोदी सरकार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र में इज़ाफ़ा कर दे।
दरअसल, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल के अपने बजट भाषण में कहा था कि महिला के मां बनने की सही उम्र के बारे में सलाह देने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई जाएगी। और हो सकता है कि टास्क फोर्स ने यदि शादी के लिए लड़की की न्यूनतम उम्र 18 की बजाए 21 साल करने की सिफारिश की, तो मोदी सरकार लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र को 18 की बजाए 21 साल कर सकती है। दरअसल, ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य मातृत्व मृत्युदर में कमी लाना है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने की सरकार की कोशिशों के पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फ़ैसला है। दरअसल, अक्टूबर, 2017 में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फ़ैसला आया था और अपने इस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि वैवाहिक बलात्कार से लड़की को बचाने के लिए बाल विवाह पूरी तरह से अवैध माना जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के लिए न्यूनतम उम्र के बारे में फ़ैसला लेने की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार पर छोड़ दी थी। कम उम्र में शादी, और शादी के बाद जल्दी बच्चे होने के कारण भारत में मातृत्व मृत्यु दर पहले काफ़ी थी, लेकिन तमाम सरकारों के प्रयासों से अब मातृत्व मृत्यु दर में पहले की तुलना में काफ़ी कमी दर्ज की गई है और इसी कारण से साल 2019 में मातृत्व मृत्यु दर प्रति 1,00,000 पर 72 थी।
इधर, काफ़ी समय से इस बात पर बहस चल रही है कि लड़के और लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र में समानता क्यों नहीं है? दरअसल, साल 2018 में लॉ कमीशन का भी कहना था कि शादी की न्यूनतम उम्र में लड़के के लिए 21 साल की उम्र, और लड़कियों के लिए 18 साल की उम्र रखना तर्कसंगत सही नहीं। क्योंकि शादी के लिए पति और पत्नी की उम्र में अन्तर रखना इस रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है कि शादी के लिए पति उम्र में बढ़ा होना चाहिए, और पत्नी उम्र में छोटी होना चाहिए। वहीं लॉ कमीशन ने कहना था कि शादी के लिए लड़का उम्र में बड़ा हो और लड़की उम्र में छोटी है इसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है।
अब यदि सरकार इन पहलुओं पर गौर करते हुए शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र 21 साल कर देती है, या फ़िर मां बनने की क़ानूनी उम्र 21 साल तय कर देती है, तो इससे महिला की बच्चे पैदा करने की क्षमता वाले सालों की संख्या अपने आप घट जाएगी। दरअसल, बाल विवाह विरोधी क़ानून होने के बाद भी देश में बाल विवाह रूक नहीं रहे हैं। इधर यूनिसेफ के आंकड़े भी काफ़ी चौकाने वाले हैं। यूनिसेफ के आकड़ों के मुताबिक़, भारत में 27 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले, और 7 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है।
भारत जैसे परम्परावादी और रूढ़ीवादी देश में विवाह एक अत्यंत नितांत निजी मामला रहा है। इसी कारण से लड़के और लड़कियों की शादियों में किसी की भी दखलंजादी परिवारवालों को पसंद नहीं आती थी और इसी कारण से बाल विवाह की कुरीति राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बहुतायत में रही है। लेकिन अंग्रेजों के वक़्त शादी को लेकर पहली बार भारत में क़ानून बने थे। वहीं साल 1955 में नया हिन्दू मैरिज एक्ट बनाया गया। यह कानून हिन्दुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों पर भी लागू हुआ करता था। हिन्दू मैरिज एक्ट के अनुसार, शादी के लिए लड़के की निम्नतम आयु 18 साल और लड़की की निम्नतम आयु 15 साल होना ज़रूरी था। बाद में साल 2012 में सिखों के लिए अपना अलग आनंद मैरिज बिल लागू किया गया। वहीं पारसी मैरिज एक्ट के अनुसार लड़के की उम्र 18 और लड़की की उम्र 15 साल होनी चाहिए थी।
लेकिन साल 1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया और इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल कर दी गई। बाल विवाह क़ानून हिन्दू समेत सभी धर्मों पर लागू होता है। अब जबकि देश में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र को 18 की बजाए 21 साल किया जा सकता है, तो ऐसे में बाल विवाह पर तो रोक लगेगी ही, साथ ही कम उम्र में लड़कियों की मां बनने की रिस्क भी नहीं रहेगी। आशा की जाना चाहिए कि जल्द ही मोदी सरकार इस तरह का क़ानून लाए, जिससे लड़के और लड़की दोनों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल हो जाए।
FEB 06 (WTN) – बाल विवाह और मातृत्व मृत्युदर अभी भी भारत में ज्वलंत समस्याएं हैं। बता दें कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए कड़े क़ानून होने, और मातृत्व मृत्युदर रोकने के लिए तमाम तरह की चिकित्सा सुविधाएं होने के बाद भी देश में बाल विवाह नहीं रूक रहे हैं। दरअसल, बाल विवाह ना रूकने के कारण लड़कियों की कम उम्र में शादी हो रही है, और कम उम में शादी होने के कारण मातृत्व मृत्यु दर भी कम नहीं हो रही है। वैसे नियम के मुताबिक़, 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी करना ग़ैर क़ानूनी है। लेकिन बाल विवाह रोकने के लिए कड़े क़ानून बनने के बाद बाल विवाह नहीं रुक रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि मोदी सरकार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र में इज़ाफ़ा कर दे।
दरअसल, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल के अपने बजट भाषण में कहा था कि महिला के मां बनने की सही उम्र के बारे में सलाह देने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई जाएगी। और हो सकता है कि टास्क फोर्स ने यदि शादी के लिए लड़की की न्यूनतम उम्र 18 की बजाए 21 साल करने की सिफारिश की, तो मोदी सरकार लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र को 18 की बजाए 21 साल कर सकती है। दरअसल, ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य मातृत्व मृत्युदर में कमी लाना है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने की सरकार की कोशिशों के पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फ़ैसला है। दरअसल, अक्टूबर, 2017 में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फ़ैसला आया था और अपने इस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि वैवाहिक बलात्कार से लड़की को बचाने के लिए बाल विवाह पूरी तरह से अवैध माना जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के लिए न्यूनतम उम्र के बारे में फ़ैसला लेने की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार पर छोड़ दी थी। कम उम्र में शादी, और शादी के बाद जल्दी बच्चे होने के कारण भारत में मातृत्व मृत्यु दर पहले काफ़ी थी, लेकिन तमाम सरकारों के प्रयासों से अब मातृत्व मृत्यु दर में पहले की तुलना में काफ़ी कमी दर्ज की गई है और इसी कारण से साल 2019 में मातृत्व मृत्यु दर प्रति 1,00,000 पर 72 थी।
इधर, काफ़ी समय से इस बात पर बहस चल रही है कि लड़के और लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र में समानता क्यों नहीं है? दरअसल, साल 2018 में लॉ कमीशन का भी कहना था कि शादी की न्यूनतम उम्र में लड़के के लिए 21 साल की उम्र, और लड़कियों के लिए 18 साल की उम्र रखना तर्कसंगत सही नहीं। क्योंकि शादी के लिए पति और पत्नी की उम्र में अन्तर रखना इस रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है कि शादी के लिए पति उम्र में बढ़ा होना चाहिए, और पत्नी उम्र में छोटी होना चाहिए। वहीं लॉ कमीशन ने कहना था कि शादी के लिए लड़का उम्र में बड़ा हो और लड़की उम्र में छोटी है इसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है।
अब यदि सरकार इन पहलुओं पर गौर करते हुए शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र 21 साल कर देती है, या फ़िर मां बनने की क़ानूनी उम्र 21 साल तय कर देती है, तो इससे महिला की बच्चे पैदा करने की क्षमता वाले सालों की संख्या अपने आप घट जाएगी। दरअसल, बाल विवाह विरोधी क़ानून होने के बाद भी देश में बाल विवाह रूक नहीं रहे हैं। इधर यूनिसेफ के आंकड़े भी काफ़ी चौकाने वाले हैं। यूनिसेफ के आकड़ों के मुताबिक़, भारत में 27 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले, और 7 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है।
भारत जैसे परम्परावादी और रूढ़ीवादी देश में विवाह एक अत्यंत नितांत निजी मामला रहा है। इसी कारण से लड़के और लड़कियों की शादियों में किसी की भी दखलंजादी परिवारवालों को पसंद नहीं आती थी और इसी कारण से बाल विवाह की कुरीति राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बहुतायत में रही है। लेकिन अंग्रेजों के वक़्त शादी को लेकर पहली बार भारत में क़ानून बने थे। वहीं साल 1955 में नया हिन्दू मैरिज एक्ट बनाया गया। यह कानून हिन्दुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों पर भी लागू हुआ करता था। हिन्दू मैरिज एक्ट के अनुसार, शादी के लिए लड़के की निम्नतम आयु 18 साल और लड़की की निम्नतम आयु 15 साल होना ज़रूरी था। बाद में साल 2012 में सिखों के लिए अपना अलग आनंद मैरिज बिल लागू किया गया। वहीं पारसी मैरिज एक्ट के अनुसार लड़के की उम्र 18 और लड़की की उम्र 15 साल होनी चाहिए थी।
लेकिन साल 1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया और इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल कर दी गई। बाल विवाह क़ानून हिन्दू समेत सभी धर्मों पर लागू होता है। अब जबकि देश में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र को 18 की बजाए 21 साल किया जा सकता है, तो ऐसे में बाल विवाह पर तो रोक लगेगी ही, साथ ही कम उम्र में लड़कियों की मां बनने की रिस्क भी नहीं रहेगी। आशा की जाना चाहिए कि जल्द ही मोदी सरकार इस तरह का क़ानून लाए, जिससे लड़के और लड़की दोनों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल हो जाए।