प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति के कारण ‘अकेला’ पड़ा पाकिस्तान
Friday - February 7, 2020 11:05 am ,
Category : WTN HINDI
विदेश नीति के बड़े खिलाड़ी साबित हो रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी
मुस्लिम देशों को बरगलाने की पाकिस्तान की कोशिशों को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नाकाम
FEB 07 (WTN) – साल 2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता नरेन्द्र मोदी ने साबित कर दिया था कि वे भारतीय राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं। कई सालों तक गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने साबित कर दिया था कि वे एक कुशल प्रशासक हैं, लेकिन देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने यह भी बता दिया है कि वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी हैं। जीहां यदि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति के बारे में चर्चा की जाए, तो प्रधानमंत्री मोदी ने साबित कर दिया है कि उनकी विदेशी नीति से भारत के ख़िलाफ़ लॉबिंग करने वाले पाकिस्तान को लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पराजय का सामना करना पड़ रहा है।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों का ख़त्म कर दिया था। अब जम्मू कश्मीर राज्य के विषय में किसी भी तरह का कोई भी फैसला लेने का पूरा अधिकार भारतीय संसद को है, लेकिन भारत सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ पाकिस्तान ने पूरी कोशिश की कि इस मामले को दुनिया के हर मंच पर उठाकर भारत सरकार के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित कराया जाए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इसके लिए पूरी कोशिश की भी, लेकिन मोदी सरकार ने ऐसे कूटनीतिक कद़म उठाए, जिससे इमरान ख़ान अपनी चालाकी में सफ़ल नहीं हो सके।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के साथ ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत के दुनिया के सभी देशों के साथ सालों से कूटनीतिक और व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे विशाल बाज़ार वाले देश को दुनिया का कोई भी देश नाराज़ करने का जोखिम नहीं ले सकता है। जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को अपने पुराने दोस्त चीन के साथ मिस्र और मलेशिया का साथ ज़रूर मिला, लेकिन इन तीनों ही देशों के अलावा किसी अन्य देश ने पाकिस्तान का साथ देने से दूरी ही बनाए रखी। वहीं मलेशिया को पाकिस्तान का साथ देने की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है। दरअसल, कश्मीर मुद्दे पर मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद द्वारा भारत विरोधी बयान देने के बाद, मोदी सरकार ने मलेशिया से पाम ऑयल का निर्यात नियंत्रित कर दिया। मोदी सरकार के इस फ़ैसले के बाद मलेशिया को एक बड़ा व्यापारिक झटका लगा है, और इसके बाद अब मलेशिया ने भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी देने से तौबा कर ली है।
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को लग रहा था कि जम्मू कश्मीर मुद्दे पर मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे। लेकिन जानकारी के लिए बता दें कि अब मुस्लिम देश भी कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन नहीं दे रहे हैं। जीहां मुस्लिमों के दो सबसे बड़े धार्मिक स्थलों वाले देश सऊदी अरब ने भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान का फ़िलहाल साथ देने से इनकार कर दिया है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, 57 मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) की बैठक 9 फरवरी से जेद्दाह में शुरू होने वाली है। दरअसल, पाकिस्तान चाहता है कि OIC के विदेश मंत्रियों के बैठक में कश्मीर का मुद्दा उठाया जाए। लेकिन मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, सऊदी अरब इस बैठक में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है, जबकि पाकिस्तान कश्मीर को लेकर तुरन्त बैठक बुलाना चाहता था।
दरअसल, सऊदी अरब समेत दुनिया के कई मुस्लिम देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर कोई भी मुस्लिम देश भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध ख़राब नहीं करना चाहता है। जहां तक सऊदी अरब की बात है, तो चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रही ज़्यादती के ख़िलाफ़ भी सऊदी अरब ने चीन के ख़िलाफ़ नरम रूख अपनाया हुआ है, और इसे चीन का अंदरूनी मामला बताते हुए चुप्पी साध ली है।
वहीं भारत के साथ सऊदी अरब के काफ़ी अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। दरअसल, सऊदी अरब अब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर पूरी तरह से आश्रित नहीं करना चाहता है। और इसके लिए सऊदी अरब सर्विस सेक्टर पर ध्यान दे रहा है, और इसके लिए सऊदी अरब भारत की मदद लेना चाहता है। इसी कारण से सऊदी अरब भारत के आंतरिक मामलों में ज़्यादा दखलंदाजी और बयानबाजी नहीं करता है। ईरान जैसा बड़ा मुस्लिम देश भी भारत के साथ खड़ा नज़र आता है। हाल ही में ईरानी सेना के एक बड़े कमाण्डर क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिका के साथ बढ़े तनाव के समय ईरान की तरफ़ से बयान आया था कि भारत यदि कोशिश करे तो ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हो सकता है।
भारत में आतंक फैलाने वाले पाकिस्तान को चारों तरफ़ से घेरने के लिए प्रधानमंत्री मोदी अपनी कूटनीति पर काम कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि कश्मीर मुद्दे समेत अन्य मुद्दों पर मुस्लिम देश या तो चुप्पी साधे हुए हैं, या फ़िर भारत के आंतरिक मामलों में दखल ना देने की बात दोहरा रहे हैं। भारत के ख़िलाफ़ बयानबाजी करके जो हाल मलेशिया का हुआ है वो देखकर छोटे मुस्लिम देश नहीं चाहते हैं कि वे भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते ख़राब करें। वहीं बड़े मुस्लिम देश भारत के साथ व्यापारिक लाभ के कारण भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान द्वारा किये जा रहे प्रोपेगेंडा का साथ नहीं दे रहे हैं। स्वाभाविक है कि मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए ऐसी कूटनीति अपनाई है, जिससे पाकिस्तान को मुस्लिम देशों तक का साथ नहीं मिल रहा है।
FEB 07 (WTN) – साल 2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता नरेन्द्र मोदी ने साबित कर दिया था कि वे भारतीय राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं। कई सालों तक गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने साबित कर दिया था कि वे एक कुशल प्रशासक हैं, लेकिन देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने यह भी बता दिया है कि वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी हैं। जीहां यदि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति के बारे में चर्चा की जाए, तो प्रधानमंत्री मोदी ने साबित कर दिया है कि उनकी विदेशी नीति से भारत के ख़िलाफ़ लॉबिंग करने वाले पाकिस्तान को लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पराजय का सामना करना पड़ रहा है।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों का ख़त्म कर दिया था। अब जम्मू कश्मीर राज्य के विषय में किसी भी तरह का कोई भी फैसला लेने का पूरा अधिकार भारतीय संसद को है, लेकिन भारत सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ पाकिस्तान ने पूरी कोशिश की कि इस मामले को दुनिया के हर मंच पर उठाकर भारत सरकार के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित कराया जाए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इसके लिए पूरी कोशिश की भी, लेकिन मोदी सरकार ने ऐसे कूटनीतिक कद़म उठाए, जिससे इमरान ख़ान अपनी चालाकी में सफ़ल नहीं हो सके।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के साथ ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत के दुनिया के सभी देशों के साथ सालों से कूटनीतिक और व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे विशाल बाज़ार वाले देश को दुनिया का कोई भी देश नाराज़ करने का जोखिम नहीं ले सकता है। जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को अपने पुराने दोस्त चीन के साथ मिस्र और मलेशिया का साथ ज़रूर मिला, लेकिन इन तीनों ही देशों के अलावा किसी अन्य देश ने पाकिस्तान का साथ देने से दूरी ही बनाए रखी। वहीं मलेशिया को पाकिस्तान का साथ देने की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है। दरअसल, कश्मीर मुद्दे पर मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद द्वारा भारत विरोधी बयान देने के बाद, मोदी सरकार ने मलेशिया से पाम ऑयल का निर्यात नियंत्रित कर दिया। मोदी सरकार के इस फ़ैसले के बाद मलेशिया को एक बड़ा व्यापारिक झटका लगा है, और इसके बाद अब मलेशिया ने भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी देने से तौबा कर ली है।
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को लग रहा था कि जम्मू कश्मीर मुद्दे पर मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे। लेकिन जानकारी के लिए बता दें कि अब मुस्लिम देश भी कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन नहीं दे रहे हैं। जीहां मुस्लिमों के दो सबसे बड़े धार्मिक स्थलों वाले देश सऊदी अरब ने भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान का फ़िलहाल साथ देने से इनकार कर दिया है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, 57 मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) की बैठक 9 फरवरी से जेद्दाह में शुरू होने वाली है। दरअसल, पाकिस्तान चाहता है कि OIC के विदेश मंत्रियों के बैठक में कश्मीर का मुद्दा उठाया जाए। लेकिन मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, सऊदी अरब इस बैठक में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है, जबकि पाकिस्तान कश्मीर को लेकर तुरन्त बैठक बुलाना चाहता था।
दरअसल, सऊदी अरब समेत दुनिया के कई मुस्लिम देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर कोई भी मुस्लिम देश भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध ख़राब नहीं करना चाहता है। जहां तक सऊदी अरब की बात है, तो चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रही ज़्यादती के ख़िलाफ़ भी सऊदी अरब ने चीन के ख़िलाफ़ नरम रूख अपनाया हुआ है, और इसे चीन का अंदरूनी मामला बताते हुए चुप्पी साध ली है।
वहीं भारत के साथ सऊदी अरब के काफ़ी अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। दरअसल, सऊदी अरब अब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर पूरी तरह से आश्रित नहीं करना चाहता है। और इसके लिए सऊदी अरब सर्विस सेक्टर पर ध्यान दे रहा है, और इसके लिए सऊदी अरब भारत की मदद लेना चाहता है। इसी कारण से सऊदी अरब भारत के आंतरिक मामलों में ज़्यादा दखलंदाजी और बयानबाजी नहीं करता है। ईरान जैसा बड़ा मुस्लिम देश भी भारत के साथ खड़ा नज़र आता है। हाल ही में ईरानी सेना के एक बड़े कमाण्डर क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिका के साथ बढ़े तनाव के समय ईरान की तरफ़ से बयान आया था कि भारत यदि कोशिश करे तो ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हो सकता है।
भारत में आतंक फैलाने वाले पाकिस्तान को चारों तरफ़ से घेरने के लिए प्रधानमंत्री मोदी अपनी कूटनीति पर काम कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि कश्मीर मुद्दे समेत अन्य मुद्दों पर मुस्लिम देश या तो चुप्पी साधे हुए हैं, या फ़िर भारत के आंतरिक मामलों में दखल ना देने की बात दोहरा रहे हैं। भारत के ख़िलाफ़ बयानबाजी करके जो हाल मलेशिया का हुआ है वो देखकर छोटे मुस्लिम देश नहीं चाहते हैं कि वे भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते ख़राब करें। वहीं बड़े मुस्लिम देश भारत के साथ व्यापारिक लाभ के कारण भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान द्वारा किये जा रहे प्रोपेगेंडा का साथ नहीं दे रहे हैं। स्वाभाविक है कि मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए ऐसी कूटनीति अपनाई है, जिससे पाकिस्तान को मुस्लिम देशों तक का साथ नहीं मिल रहा है।