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जानिए क्यों अमेरिका-तालिबान शान्ति समझौते से बढ़ी भारत की ‘चिन्ता’?

Monday - March 2, 2020 1:09 pm , Category : WTN HINDI
अफगानिस्तान में अब फ़िर से ‘शक्तिशाली’ होगा तालिबान!
अफगानिस्तान में अब फ़िर से ‘शक्तिशाली’ होगा तालिबान!

अमेरिका-तालिबान शान्ति समझौते से बजी भारत के लिए ‘ख़तरे की घण्टी’

MARCH 02 (WTN) – दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका जब किसी आतंकवादी संगठन के साथ समझौता करे, तो यह अपने आप में एक बहुत बड़ी घटना है। जीहां, जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका ने अफगानिस्तान के आतंकी संगठन तालिबान के साथ एक अहम शान्ति समझौता किया है। कतर की राजधानी दोहा में हुए इस शान्ति समझौते के बाद पूरी दुनिया की निगाहें इस शान्ति समझौते के परिणामों पर टिकी हुई हैं। बता दें कि भारत समेत दुनिया के 30 देश इस ऐतिहासिक शान्ति समझौते के गवाह बने थे। इस दौरान कतर में भारतीय राजदूत पी कुमारम भी मौजूद रहे। बता दें कि ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी भारतीय अधिकारी ने तालिबान की मौजूदगी में किसी कार्यक्रम में शिरकत की थी। हालांकि, इस समझौते के दौरान अफगानिस्तान सरकार की तरफ से कोई भी प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तालिबान के साथ अमेरिका के इस समझौते के बाद, अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी तय हो गई है। इस शान्ति समझौते के तहत, अफगानिस्तान में 18 सालों से तैनात अमेरिकी सेना आने वाले 14 महीनों के वापस अमेरिका लौट जाएगी। हालांकि, यह शान्ति समझौता अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ है। लेकिन इस शान्ति समझौते का भारत पर काफ़ी विपरित असर पड़ सकता है। लेकिन आख़िर ऐसा क्यों? आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।

सबसे पहले तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के वक़्त प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प ने तालिबान के साथ शान्ति समझौते को अपने चुनाव प्रचार की स्ट्रैटजी में शामिल किया था। ट्रम्प ने चुनाव के वक़्त वादा किया था कि यदि वे राष्ट्रपति बनते हैं, तो वॉर ज़ोन में लगे अमेरिकी सैनिकों की वापसी को सुनिश्चित करेंगे। और तालिबान के साथ हुआ शान्ति समझौता उसी वादे का एक हिस्सा है, जिसमें तालिबान से समझौते के बाद अमेरिकी सैनिक धीरे-धीरे अफगानिस्तान से वापस अमेरिका लौट जाएंगे। हालांकि, ऐसा नहीं है कि तालिबान के साथ शान्ति समझौते का अमेरिका में विरोध नहीं हो रहा है। तालिबान के साथ हुए शान्ति समझौते पर अमेरिका में भी विवाद शुरू हो गया है।
 
जानकारी के लिए बता दें कि अफगानिस्तान के साथ शान्ति समझौते का विरोध सबसे पहले अमेरिका के रक्षा मंत्री रहे जेम्स मैट्टिस ने किया था। राष्ट्रपति ट्रम्प चूंकि तालिबान के साथ शान्ति समझौते के वादे पर अड़े थे, इसलिए इसके विरोध में जेम्स मैट्टिस ने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। अमेरिका के कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान के साथ अमेरिका का शान्ति समझौता किसी भी दृष्टिकोण से समझदारी भरा फ़ैसला नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि तालिबान के साथ अमेरिका के शान्ति समझौते से अफगानिस्तान और उसके आसपास के कई देशों में अस्थिरता बढ़ सकती है।

बता दें कि अमेरिका के साथ शान्ति समझौते की बातचीत के चलते ही पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में कोई भी बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। तालिबान ने शान्ति समझौते में वादा किया है कि वो अफगानिस्तान की ज़मीन से आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देगा, और अलकायदा समेत अन्य आतंकी संगठनों के आतंकियों को पनाह भी नहीं देगा। लेकिन ऐसा तभी होगा जब अमेरिका सैनिक अफगानिस्तान से वापस चले जाएंगे। आतंकी संगठन अपने वादों पर कितना खरा उतरते हैं, इसका अंदाज़ा तो इतिहास को देखकर ही लगाया जा सकता है। लेकिन अमेरिका का तालिबान के साथ हुआ यह शान्ति समझौता भारत की चिन्ता को बढ़ाने वाला है।

जहां तक अमेरिका-तालिबान शान्ति समझौते की बात है, तो जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि इस शान्ति समझौते में भारतीय प्रतिनिधि भी शामिल हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी भारत को इस शान्ति समझौते से किसी भी तरह का कोई भी फ़ायदा नहीं होने वाला है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का विपरित असर भारत पर पड़ सकता है क्योंकि पाकिस्तान के इशारे पर तालिबानी आतंकी कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को बढ़ा सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तालिबान का हक्कानी नेटवर्क कश्मीर में गड़बड़ी फैलाना चाहता है। और इसी हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास पर हमले भी किए हैं। अब अमेरिका ने उसी हक्कानी नेटवर्क वाले तालिबान के साथ शान्ति समझौता किया है। स्वाभाविक है कि इससे अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क का प्रभाव बढ़ेगा।

अमेरिका के साथ शान्ति समझौते के बाद तालिबान और उसका हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान की सरकार से बातचीत करेंगे। अफगानिस्तान में तालिबान का शान्ति समझौता, फ़िर उसके बाद अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी, और फ़िर तालिबान और उसके हक्कानी नेटवर्क का अफगानिस्तान की मुख्य धारा की राजनीति में शामिल होना कहीं से भी भारत के हितों के लिए सही नहीं है।

साफ़ है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद भारत की सबसे बड़ी चिन्ता कश्मीर पर होगी, क्योंकि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के इशारे पर कश्मीर में हिंसा फैला सकते हैं। वहीं भारत सरकार को दूसरी बड़ी चिन्ता अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार की स्थिरता को लेकर है। जानकारों के मुताबिक़, अमेरिका-तालिबान के समझौते के बाद पाकिस्तान का इस क्षेत्र में दबदबा बढ़ सकता है। और यदि पाकिस्तान के प्रभाव वाले तालिबान की ताकत बढ़ेगी, तो इससे कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों पर हमले बढ़ सकते हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि इस समय पाकिस्तान में क़रीब बीस से तीन हज़ार आतंकवादी मौजूद हैं। ऐसे में यह आतंकी भारत के ख़िलाफ़ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान में तालिबान के पास शरण हासिल कर सकते हैं। वहीं तालिबान के साथ मिलकर पाकिस्तान की सेना भारत के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर की नई रणनीति भी बना सकती है। दरअसल, जब तक अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिक हैं, तालिबानी आतंकियों पर दवाब है और वे भारत के कश्मीर के तरफ़ अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद पाकिस्तान की सेना तालिबान आतंकियों के साथ मिलकर भारत के ख़िलाफ़ आतंकी गतिविधियों के लिए प्लानिंग कर सकती है।

जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान का हमेशा से ही तालिबान को संरक्षण रहा है, और तालिबान पर पाकिस्तान की सेना का बहुत प्रभाव है। तालिबान पर अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल पाकिस्तान अमेरिका को कश्मीर और अन्य मामलों में ब्लैकमेलिंग करने में भी करता रहा है। वहीं तालिबान हमेशा से ही अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। वैसे यदि अमेरिका के साथ शान्ति समझौते होने के बाद तालिबान अफगानिस्तान की सरकार के साथ वार्ता करता भी है, तो इस बात की कोई भी गारण्टी नहीं है कि तालिबान अफगानिस्तान के वर्तमान संविधान और लोकतंत्र का पालन करेगा।

भारत के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण था कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना मौजूद रहे। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत ने अफगानिस्तान में  अस्पतालों, स्कूलों और सड़कों के निर्माण में क़रीब 3 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है। अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार पाकिस्तान के बजाय भारत के ज़्यादा क़रीब है। लेकिन अब जबकि अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन तालिबान ताक़तवर बनने जा रहा है, ऐसे में भारत सरकार का भारतीय हितों के लिए चिन्तित होना स्वाभाविक है।