यदि अफवाह फैलाने से गई किसी की जान, तो हो सकती है उम्रक़ैद की सज़ा
Tuesday - March 3, 2020 10:45 am ,
Category : WTN HINDI
साइबर क्राइम में हो सकती है जेल की सज़ा
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का सावधानी से करें इस्तेमाल, अफवाह फैलाने पर जाना पड़ सकता है जेल
MARCH 03 (WTN) – स्वाभाविक है कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में आप अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल तो करते ही होंगे। अब जबकि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े जनसंख्या वाले देश भारत में करोड़ों की तादात में स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट यूज़र्स हैं, तो ऐसे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम के साथ ही इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप का भारत में करोड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। वैसे तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विचारों की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम आजकल माना जाता है, लेकिन देखा गया है कि दिनों दिन सोशल मीडिया का दुरूपयोग बढ़ता ही जा रहा है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दिल्ली में हुए दंगों के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिये बड़े पैमाने पर अफवाहें फैलाई गई हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यदि किसी भी व्यक्ति ने सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहें फैलाई, तो ऐसे में उस व्यक्ति पर कड़ी क़ानून कार्रवाई तक हो सकती है। जीहां, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोशल मीडिया पर ऐसी किसी भी तरह की अफवाह को फैलाना साइबर क्राइम माना जाता है, जिसमें किसी भी धर्म या जाति की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है या फिर दंगे हो सकते हैं। यदि कोई ऐसा करता हुआ दोषी पाया जाता है, तो आईटी एक्ट की 2008 के तहत दोषी को आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है।
यदि कोई भी व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के ज़रिये अफवाहें फैलाता है, तो ऐसा करने वाले के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज़ किया जा सकता है और उसको गिरफ़्तार भी किया जा सकता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा या स्थान आदि के नाम पर नफ़रत फैलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153 A के तहत मुक़दमा दर्ज़ किया जा सकता है। वहीं जानकारी के लिए बता दें कि यदि कोई व्यक्ति लिखकर, बोलकर, इशारे से या अन्य किसी दूसरे तरीक़े से साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश करता है, तो उसके ख़िलाफ़ भी केस दर्ज़ किया जा सकता है। चूंकि इस तरह के अपराध ग़ैरज़मानती अपराध होते हैं, ऐसे में पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ़्तार कर सकती है। इस तरह के मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन साल तक क़ैद के साथ ही जुर्माना भी लग सकता है।
वहीं यदि कोई व्यक्ति अफवाह फैलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा-505 के तहत भी केस दर्ज़ हो सकता है। साथ ही यदि कोई व्यक्ति नफ़रत फैलाने के लिए कोई बयान देता है, तो उसके ख़िलाफ़ भी आईपीसी की धारा 505 के तहत केस दर्ज़ किया जा सकता है। इस मामले में भी दोषी पाए जाने पर दोषी को तीन साल की सज़ा हो सकती है।
वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सएप के ज़रिये होने वाले अपराधों को रोकने के लिए साल 2000 में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट-2000 बनाया गया था। इस एक्ट की धारा-67 के तहत अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर भड़काऊ, आपत्तिजनक, या नफ़रत फैलाने वाले पोस्ट या वीडियो शेयर करता है, तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ हो सकता है और उसे जेल तक हो सकती है। साथ ही दोषी पर कोर्ट जुर्माना तक लगा सकता है। आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत यदि कोई पहली बार सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने का दोषी पाया जाता है, तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है, और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। अगर यदि यही अपराध वो दूसरी बार करते हुए दोषी पाया जाता है, तो दोषी को 5 साल तक की जेल औऱ 10 लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
यदि सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई किसी पोस्ट या वीडियो से साम्प्रदायिक हिंसा भड़कती है और इसमें किसी की मौत हो जाती है, तो ऐसे में दोषी को आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है। वहीं यदि किसी के सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिये अफ़वाह फैलाती है और उससे तोड़फोड़ होती है, तो इससे सार्वजनिक सम्पत्ति का जो नुकसान होता है उस नुकसान की वसूली अफ़वाह फैलाने वाले से किये जाने का प्रावधान है। वहीं सबसे ज़्यादा सतर्कता व्हाट्सएप पर मैसेज सेंड या फॉरवर्ड करते समय रखना चाहिए। यदि ग़लती से भी आपसे कोई भी विवादित मैसेज सेंड या फॉरवर्ड हो जाता है, तो आईटी एक्ट की धारा-66A के अनुसार अनजाने में भी भेजे गए विवादित मैसेज को फॉरवर्ड करने पर आपको जेल की सज़ा हो सकती है। ऐसे में हमारी आपको सलाह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतें, क्योंकि आपके द्वारा की गई एक भी ग़लत पोस्ट आपको जेल पहुंचा सकती है।
MARCH 03 (WTN) – स्वाभाविक है कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में आप अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल तो करते ही होंगे। अब जबकि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े जनसंख्या वाले देश भारत में करोड़ों की तादात में स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट यूज़र्स हैं, तो ऐसे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम के साथ ही इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप का भारत में करोड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। वैसे तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विचारों की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम आजकल माना जाता है, लेकिन देखा गया है कि दिनों दिन सोशल मीडिया का दुरूपयोग बढ़ता ही जा रहा है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दिल्ली में हुए दंगों के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिये बड़े पैमाने पर अफवाहें फैलाई गई हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यदि किसी भी व्यक्ति ने सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहें फैलाई, तो ऐसे में उस व्यक्ति पर कड़ी क़ानून कार्रवाई तक हो सकती है। जीहां, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोशल मीडिया पर ऐसी किसी भी तरह की अफवाह को फैलाना साइबर क्राइम माना जाता है, जिसमें किसी भी धर्म या जाति की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है या फिर दंगे हो सकते हैं। यदि कोई ऐसा करता हुआ दोषी पाया जाता है, तो आईटी एक्ट की 2008 के तहत दोषी को आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है।
यदि कोई भी व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के ज़रिये अफवाहें फैलाता है, तो ऐसा करने वाले के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज़ किया जा सकता है और उसको गिरफ़्तार भी किया जा सकता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा या स्थान आदि के नाम पर नफ़रत फैलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153 A के तहत मुक़दमा दर्ज़ किया जा सकता है। वहीं जानकारी के लिए बता दें कि यदि कोई व्यक्ति लिखकर, बोलकर, इशारे से या अन्य किसी दूसरे तरीक़े से साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश करता है, तो उसके ख़िलाफ़ भी केस दर्ज़ किया जा सकता है। चूंकि इस तरह के अपराध ग़ैरज़मानती अपराध होते हैं, ऐसे में पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ़्तार कर सकती है। इस तरह के मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन साल तक क़ैद के साथ ही जुर्माना भी लग सकता है।
वहीं यदि कोई व्यक्ति अफवाह फैलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा-505 के तहत भी केस दर्ज़ हो सकता है। साथ ही यदि कोई व्यक्ति नफ़रत फैलाने के लिए कोई बयान देता है, तो उसके ख़िलाफ़ भी आईपीसी की धारा 505 के तहत केस दर्ज़ किया जा सकता है। इस मामले में भी दोषी पाए जाने पर दोषी को तीन साल की सज़ा हो सकती है।
वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सएप के ज़रिये होने वाले अपराधों को रोकने के लिए साल 2000 में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट-2000 बनाया गया था। इस एक्ट की धारा-67 के तहत अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर भड़काऊ, आपत्तिजनक, या नफ़रत फैलाने वाले पोस्ट या वीडियो शेयर करता है, तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ हो सकता है और उसे जेल तक हो सकती है। साथ ही दोषी पर कोर्ट जुर्माना तक लगा सकता है। आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत यदि कोई पहली बार सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने का दोषी पाया जाता है, तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है, और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। अगर यदि यही अपराध वो दूसरी बार करते हुए दोषी पाया जाता है, तो दोषी को 5 साल तक की जेल औऱ 10 लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
यदि सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई किसी पोस्ट या वीडियो से साम्प्रदायिक हिंसा भड़कती है और इसमें किसी की मौत हो जाती है, तो ऐसे में दोषी को आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है। वहीं यदि किसी के सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिये अफ़वाह फैलाती है और उससे तोड़फोड़ होती है, तो इससे सार्वजनिक सम्पत्ति का जो नुकसान होता है उस नुकसान की वसूली अफ़वाह फैलाने वाले से किये जाने का प्रावधान है। वहीं सबसे ज़्यादा सतर्कता व्हाट्सएप पर मैसेज सेंड या फॉरवर्ड करते समय रखना चाहिए। यदि ग़लती से भी आपसे कोई भी विवादित मैसेज सेंड या फॉरवर्ड हो जाता है, तो आईटी एक्ट की धारा-66A के अनुसार अनजाने में भी भेजे गए विवादित मैसेज को फॉरवर्ड करने पर आपको जेल की सज़ा हो सकती है। ऐसे में हमारी आपको सलाह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतें, क्योंकि आपके द्वारा की गई एक भी ग़लत पोस्ट आपको जेल पहुंचा सकती है।