कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने बड़ा कारगर साबित होगा 'यह' 123 साल पुराना क़ानून!
नासमझ जनता को समझाने अब सख़्ती करेंगी सरकारें
MARCH 24 (WTN) - जैसा कि आप जानते ही हैं कि चीन के वुहान शहर से फैली वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया थम सी गई है। इस लेख को लिखे जाने तक पूरी दुनिया में कोरोनो वायरस संक्रमण के कारण 16,500 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। जहां तक भारत में कोरोनो वायरस संक्रमण की बात है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दे कि भारत में कोरोनो वायरस संक्रमण के कारण अभी तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है और 500 से ज़्यादा लोग संक्रमित हैं। कोरोनो वायरस संक्रमण से बचाव के लिए भारत सरकार ऐतिहासिक क़दम उठा रही है। लॉक डाउन और कर्फ़्यू से लेकर रेल यातायात को बंद करने जैसे ऐतिहासिक फ़ैसले मोदी सरकार अब तक ले चुकी है।
जैसा कि आप जानते हैं कि कोरोनो वायरस संक्रमण से बचाव का सबसे कारगर तरीक़ा है कि लोगों का एक दूसरे से आपसी सम्पर्क ना हो। लेकिन देखा जा रहा है कि तमाम तरह की समझाइश और चेतावनी के बाद भी लोग घरों से बाहर निकलना बंद नहीं कर रहे हैं। ऐसे में इस महामारी पर लगाम लगाने के लिए मोदी सरकार 123 साल पुराने एक क़ानून का सहारा ले रही है, जिससे घरों में बंद न रहने वाले लोगों पर उचित क़ानूनी कार्रवाई की जा सके।
आपकी जानकारी के लिए बता कि Epedemic Diseases Act 1897 के तहत अब केन्द्र और राज्य सरकारें विशेष अधिकारों के जरिए कोरोना वायरस की रोकथाम के प्रयास के लिए लोगों पर उचित कार्रवाई कर सकती है। बता दें कि इस क़ानून के तहत यदि कोई व्यक्ति सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों का पालन नहीं करता है तो सरकार उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करते हुए उसे जेल में डाल सकती है। दरअसल,इस क़ानून को पहली बार साल 1896 में प्लेग की बीमारी बॉम्बे प्रेसीडेंसी में फैलने पर लागू किया गया था।
Epedemic Diseases Act 1897 केन्द्र और राज्य सरकारों को कई विशेष अधिकार देता है। जानकारी के लिए बता दें कि इस क़ानून में सिर्फ़ 4 प्रावधान हैं। ज़रूरत के वक़्त इस कानून को तब ही लागू किया जाता है जब सरकारों को यह महसूस होने लगता है कि मौजूदा नियमों के तहत लोगों और परिस्थितियों पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है। इसके क़ानून के तहत केन्द्र या राज्य सरकार को काफ़ी विशेष अधिकार मिलते हैं कि वो किसी क्षेत्र विशेष को डेंजर ज़ोन मान सकती हैं, और इस क्षेत्र में लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगा सकती है या फ़िर किसी की भी जांच के आदेश दे सकती हैं।
100 साल से भी पुराने इस क़ानून के सेक्शन 2A के अनुसार, केन्द्र सरकार को यह अधिकार हासिल हो जाता है कि वो देश के बंदरगाहों पर आने वाले किसी भी जहाज की जांच कर सकती है। बता दें कि जब यह क़ानून बना था तब विदेशों की यात्राएं समुद्र के रास्ते ही सम्भव थीं। इस क़ानून के ज़रिए अगर किसी विदेशी यात्री के द्वारा महामारी का वायरस फ़ैलने की आशंका होती है, तो सरकार इस क़ानून के ज़रिए दूसरे देश के यात्री को भारत में प्रवेश के लिए मना कर सकती है।
वहीं इस क़ानून के तहत यदि कोई सरकारी कर्मचारी या फ़िर अन्य ज़िम्मेदार पद पर बैठा कोई व्यक्ति अपनी ड्यूटी निभाने से मना करता है, तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है। एक सदी पुराने इस क़ानून के ज़रिए सरकार हर उस व्यक्ति को आइसोलेट कर सकती है जिसे संक्रमित बीमारी होने का शक होता है। हालांकि, ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए इस क़ानून का तब काफ़ी विरोध हुआ था कि ब्रिटिश सरकार इस क़ानून के ज़रिए भारतीयों पर अत्याचार कर रही है। लेकिन ब्रिटिश राज का यही क़ानून आज केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए बहुत बड़ा सहारा बनने जा रहा है, जिसकी सहायता से सरकार लोगों पर इस तरह के प्रतिबन्ध लगा सकेगी जिससे कोरोनो वायरस जैसी महामारी के संक्रमण को रोका जा सके।