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UV किरणें कोरोना वायरस को सैनेटाइज़ करने में साबित हो सकती हैं कारगर

Thursday - April 16, 2020 4:40 pm , Category : WTN HINDI

कोरोना वायरस संक्रमण की वैक्सीन के लिए शोध जारी, संक्रमण को ख़त्म करने जुटे डॉक्टर्स और वैज्ञानिक

APRIL 16 (WTN) - कोरोना वायरस संक्रमण इस समय मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चीन के वुहान शहर से उपजी और फैली कोरोना वायरस संक्रमण की बीमारी 200 से ज़्यादा देशों में फैल गई है। इस लेख को लिखे जाने तक कोरोना वायरस संक्रमण के कारण अभी तक पूरी दुनिया में 1,35,239 लोगों की मौत हो चुकी है। जैसा कि आप जानते हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए पूरी दुनिया में डॉक्टर्स, वैज्ञानिक और तमाम शोधकर्ता कोरोना वायरस संक्रमण की वैक्सीन खोजने में लगे हुए हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी की वैक्सीन की खोज पर तो पूरी दुनिया में युद्धस्तर पर काम चल ही रहा है। वहीं कोरोना वायरस को हवा, पानी और तमाम सतहों पर किस तरह से ख़त्म किया जा सकता है इस पर भी लगातार शोध जारी हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सांता बारबरा के सॉलिड स्टेट लाइटिंग और एनर्जी इलेक्ट्रॉनिक सेंटर (SSLEEC) के शोधकर्ता एक ऐसी एलईडी बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं जो हवा और पानी सहित सभी सतहों को SARS COV-2 से संक्रमण मुक्त कर सकती है। बता दें कि शोधकर्ताओं को अल्ट्रावॉयलेट (UV) एलईडी से बहुत उम्मीदें हैं।

इस शोध में शामिल क्रिस्चियन जोलनर इस तकनीक के सैनेटाइजेशन और शुद्धिकरण प्रक्रिया में इस्तेमाल पर काफी लम्बे वक़्त से काम कर रहे हैं। इस बारे में उनका कहना है कि चिकित्सकीय क्षेत्र में अल्ट्रावॉयलेट डिस्इंफेक्शन उत्पादों का काफ़ी पहले से इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन अब नोवल कोरोना वायरस को अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश से बेअसर करने की शक्ति पर इन दिनों शोध जारी है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश से संक्रमण मुक्त करने की तकनीक का काफ़ी पहले से इस्तेमाल हो रहा है। वैसे SARS COV-2 के मामले में अभी बड़े पैमाने पर इस तकनीक की उपयोगिता साबित नहीं हुई है, लेकिन फिर भी SSLEEC की एक सहायक कम्पनी के मुताबिक़, अल्ट्रावॉयलेट एलईडी उत्पादों से केवल 30 सेकेंड में ही कोरोना वायरस का 99.9 प्रतिशत कीटाणुशोधन हो सकता है।

जैसा कि आप जानते ही होंगे कि अल्ट्रावॉलेट प्रकाश कई तरह के होते हैं। इनमें से UV-A और UV-B सूर्य से आने वाली किरणों के ज़रिए आते हैं। जबकि UV-C मानव निर्मित उपकरणों से ही बनता हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार उच्च स्तरीय UV- C एलईडी एल्यूमीनियम गैलियम नाइट्राइड की सतह पर सिलकॉन कार्बाइड के एक प्रारूप को लगाने से मिलता है। जानकारों के अनुसार, आमतौर पर इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल वाटर प्यूरीफायर्स में किया जाता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि UV-C एलईडी तकनीक लोगों को साफ़ पानी उपलब्ध कराने के अभियान में गेम चेंजर हो सकती है।

प्रो. जोलनर के अनुसार, इस तकनीक को ऐसे सिस्टम से भी जोड़ा जा सकता है जो तभी काम करे जब आसपास कोई न हो। प्रो. जोलनर का कहना है कि सार्वजनिक स्थानों पर भी पानी को सस्ते में, बिना किसी केमिकल के साफ करने की इससे आसान सुविधा मिलेगी। इसी कारण से यह COVID-19 के मामले में भी एक गेम चेंजर साबित हो सकती है। फ़िलहाल जोलनर के साथी किफायती और सटीक UV-C लाइट एमिटर्स के उत्पादन पर अपना ध्यान लगा रहे हैं।

वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि UV-C किरणें इंसानों के लिए हानिकारक होती हैं। यह किरणें इंसानी त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। 260-285 नैनो मीटर रेंज की ये किरणें अभी डिस्इंफेक्शन तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। ख़ैर, नियंत्रित हालातों में जहां इन किरणों के मानवीय संपर्क में आनी की आशंका पूरी तरह से ख़त्म हो जाए, वहां इसकी उपयोगिता बहुत दिखाई देती है। ऐसा वाटर प्यूरीफायर्स में होता है और ऐसे मामलों में प्रयोग सफल भी हो सकता है। वहीं मेडिकल उपकरणों को नियंत्रित हालातों में सैनेटाइज करने के काम में यह तकनीक बहुत मददगार साबित हो सकती है। इसके अलावा इस तकनीक का सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल कब और कैसे हो सकता है यह भी एक अलग शोध का विषय है।