चीन और WHO प्रमुख की 'मिलीभगत' से कोरोना वायरस महामारी से हज़ारों लोगों की मौत
चीन की वामपंथी सरकार की ग़लती, लापरवाही और हठधर्मिता का खामियाजा भुगत रही दुनिया
APRIL 18 (WTN) - चीन की वामपंथी सरकार की ग़लती, लापरवाही और हठधर्मिता का खामियाजा आज पूरी दुनिया भुगत रही है। चीन के वुहान शहर से उपजी और फैली कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी से पूरी दुनिया में अभी तक 1,54,828 लोगों की मौत हो गई है। लेकिन इस सबके बीच, WHO (World Health Organization) यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, अमेरिका समेत दुनिया के देशों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी (COVID-19) के पूरी दुनिया में फैलने और हज़ारों लोगों की मौत के लिए चीन की वामपंथी सरकार और WHO प्रमुख टेड्रोस एडहैनॉम काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कोरोना वायरस संक्रमण के कारण अमेरिका में सबसे ज़्यादा 32,175 लोगों की मौत हो चुकी है। इसी से नाराज़ और गुस्साए अमेरिका ने WHO को दी जाने वाली वार्षिक वित्तीय सहायता पर रोक लगा दी। अमेरिका का खुले तौर पर कहना है कि चीन की वामपंथी सरकार और WHO प्रमुख टेड्रोस एडहैनॉम की मिलीभगत से ही कोरोना वायरस संक्रमण की बीमारी विश्वव्यापी हो गई है।
कुछ विदेशी पत्रिकाओं में तो WHO प्रमुख ट्रेडोस को 'आतंकवादी' तक कहा गया है। दरअसल, WHO प्रमुख टेड्रोस इथोपिया की टिगरे लिब्रेशन फ्रंट नामक उस पार्टी से जुड़े रहे हैं और बड़े पदाधिकारी रहे हैं, जिसे अमेरिका ने 90 के दशक में आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल किया था। टिगरे लिब्रेशन फ्रंट कम्युनिस्ट विचारधारा की पार्टी थी, जिसने बाद में इथोपिया में सत्ता भी संभाली थी। अब चूंकि चीन में कम्युनिस्ट शासन है, इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि WHO प्रमुख की वामपंथी विचारधारा के कारण ही WHO ने चीन की हर ग़लती को नज़रअंदाज़ किया।
जैसा कि आप जानते हैं कि चीन के पड़ोसी देश ताइवान के महामारी कमांड केंद्र ने पिछले साल 31 दिसंबर को ही WHO को साफ़ तौर पर बता दिया था कि कोरोना वायरस के कारण मनुष्यों से मनुष्यों में संक्रमण की भारी आशंका है। लेकिन ताइवान की इस चेतावनी को WHO ने गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसके कारण कोरोनो वायरस संक्रमण की बीमारी वैश्विक महामारी बन गई। दरअसल, ताइवान अब तक WHO का सदस्य देश नहीं है क्योंकि चीन हमेशा से ही ताइवान को अपना ही हिस्सा बताता रहा है। इसलिए ताइवान की स्वतंत्र पहचान को WHO ने चीन के दबाव में मंज़ूर नहीं और ताइवान की चेतावनी को WHO ने नहीं माना।
दरअसल, इस साल जनवरी के आख़िर में WHO प्रमुख टेड्रोस एडहैनॉम ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। इस दौरान टेड्रोस ने वैश्विक महामारी से निपटने के लिए चीन की प्रशंसा की थी। इतना ही नहीं, टेड्रोस ने कोरोना वायरस बीमारी के ख़िलाफ़ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा किए जा रहे कामों की तारीफ़ भी की थी। उस समय जबकि चीन में कोरोना वायरस संक्रमण लगातार फैल रहा था, उस समय भी WHO प्रमुख टेड्रोस एडहैनॉम ने चीन में यात्रा की वकालत तक की।
कुछ जानकारों का मानना है कि WHO ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि WHO यह समझ रहा था कि चीन के किसी भी तरह के विरोध के कारण COVID-19 जैसी वैश्विक महामारी से जुड़ी सूचनाएं और शोध मिलने बंद हो गए, तो संकट और भी गहरा सकता है। दरअसल, चीन वैश्विक समुदाय के साथ COVID-19 से जुड़ी सूचनाएं सीमित करने के साथ ही WHO के विशेषज्ञों को भी चीन जाने से मना कर सकता था।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दुनिया भर में 194 सदस्य देश हैं। यह अभी 194 देश हर साल सदस्यता राशि के रूप में और दान राशि के तहत हर साल WHO को फण्ड देते हैं। बता दें कि साल 2014 की तुलना में चीन की तरफ से WHO के लिए फंडिंग 52 प्रतिशत तक बढ़ा दी गई। माना कि यह रकम बड़ी है, लेकिन अमेरिका की तुलना में बहुत कम। WHO को दुनिया से जितना फण्ड मिलता है, उसका क़रीब 15 प्रतिशत सिर्फ़ अमेरिका देता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि WHO को सबसे ज़्यादा वित्तीय सहायता देने वाले टॉप टेन मददगारों की सूची में चीन का नंबर नहीं है। लेकिन फिर भी कोरोना वायरस संक्रमण जैसी महामारी में चीन की वामपंथी सरकार की नाकामी पर भी WHO जैसा संगठन चीन का हिमायती कैसे हो सकता है? लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि WHO के लिए चीन के लगातार बड़े फंडर होने की संभावनाएं नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं क्योंकि चीन के 'हेल्थ सिल्क रोड' प्रोजेक्ट में WHO की भागीदारी हो। ख़ैर, कारण कुछ भी हो। लेकिन चीन की वामपंथी सरकार और वामपंथी विचारधारा वाले WHO प्रमुख ट्रेडोस की मिलीभगत का नुकसान पूरी दुनिया को उठाना पड़ रहा है।