जानिए कैसा होता है कृत्रिम सूरज?
असली सूर्य से 13 गुना ज़्यादा रोशनी और गर्मी देगा कृत्रिम सूरज
MAY 27 (WTN) - यह तो आप अच्छे से जानते ही हैं कि पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व सूर्य के कारण ही संभव है। और आप यह भी जानते ही हैं कि हमारे सौरमण्डल में एक ही सूर्य है, लेकिन यदि हम आपसे कहें कि चीन अपना एक अलग सूर्य बना रहा है, तो यह पढ़कर आपको आश्यर्च हुआ होगा। जी हां, अब चीन कृत्रिम सूरज पर तेजी से काम कर रहा है। चीन का दावा है उसके द्वारा बनाया जा रहा नकली सूरज असली सूरज से लगभग 13 गुना तक ज्यादा रोशनी और गर्मी देगा।
दरअसल, वैज्ञानिकों का कहना है कि सूरज की रोशनी कम होती जा रही है। शोध भी यही बताते हैं कि आकाशगंगा के अन्य तारों की तुलना में हमारा सूरज जल्दी कमजोर हो रहा है। और इस कारण से पृथ्वी पर हिमयुग जैसी आशंकाएं जताई जा रही हैं। इसी के मद्देनजर चीन के वैज्ञानिक काफी लम्बे समय से कृत्रिम सूरज तैयार करने में लगे हुए थे, और अब उनको इसमें सफलता हासिल हो गई है। दरअसल, कृत्रिम सूरज एक ऐसा परमाणु फ्यूजन है, जो असली सूरज से 13 गुना ज्यादा ऊर्जा दे सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन के अलावा दुनिया के अन्य कई सारे देश भी कृत्रिम सूरज बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इसके लिए गर्म प्लाज्मा को एक जगह पर रखना और उसे फ्यूजन तक उसी हालत में रखने में सबसे बड़ी मुश्किल आ रही थी। कृत्रिम सूरज का चीन का यह प्रोजेक्ट साल 2006 से चल रहा है।
चीन के वैज्ञानिक जो कृत्रिम सूरज बना रहे हैं उसका नाम HL-2M है, जिसे चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन और साउथवेस्टर्न इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के वैज्ञानिकों ने मिलकर बनाया है। कृत्रिम सूरज बनाने के लिए चीन के Leshan शहर में एक रिएक्टर तैयार किया गया था।
कृत्रिम सूरज बनाने के लिए हाइड्रोजन गैस को 5 करोड़ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर गर्म किया गया और फिर उस तापमान को 102 सेकंड तक स्थिर रखा गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, असली सूर्य में हीलियम और हाइड्रोजन जैसी गैसें उच्च तापमान पर क्रिया करती हैं। इस दौरान 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक ऊर्जा निकलती है। चीन के वैज्ञानिकों ने इसी उच्च ऊर्जा वाले तापमान को पैदा करने के लिए काफी लंबा प्रयोग किया।
कृत्रिम सूर्य बनाने की प्रक्रिया के दौरान इसके परमाणुओं को प्रयोगशाला में विखंडित किया गया। जिसके बाद प्लाज्मा विकिरण से सूर्य का औसत तापमान पैदा किया गया, फिर उस तापमान से फ्यूजन यानी संलयन की प्रतिक्रिया हासिल की गई। और फिर इसी आधार पर अणुओं का विखंडन हुआ, जिससे उन्होंने ज्यादा मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित की। यह प्रक्रिया लगातार और समय बढ़ा-बढ़ाकर दोहराई जाती रही। हालांकि, प्रयोग के दौरान कई बार अफलता हाथ भी आई।
लेकिन काफी प्रयत्नों के बाद चीनी वैज्ञानिकों को आखिरकार सफलता हासिल हुई। प्रयोग के दौरान देखा गया कि कृत्रिम सूरज पर इस प्रयोग में असली सूरज से भी ज्यादा ऊर्जा पैदा की जा सकती है। प्रयोग के दौरान कृत्रिम सुरज पर 200 मिलियन डिग्री सेल्सियस की ऊर्जा थी, जो कि असली सूरज से 13 गुना ज्यादा थी।
चीन के वैज्ञानिकों का यह अविष्कार उस प्रोजेक्ट का एक हिस्सा है, जिसमें न्यूक्लियर फ्यूजन से साफ-सुथरी ऊर्जा प्राप्त की जा सके। वैज्ञानिकों के अनुसार, कृत्रिम सूरज से मिलने जा रही ऊर्जा, एनर्जी के दूसरे स्त्रोतों से कहीं अधिक सस्ती और पर्यावरण के लिए कम हानिकारक साबित होगी।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कृत्रिम सूरज की अवधारणा सही साबित होती है, तो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बहुत कम हो जाएगी। वहीं, कृत्रिम सूरज से उत्पन्न की गई नाभिकीय ऊर्जा को विशेष तकनीक से पर्यावरण के लिये सुरक्षित ग्रीन ऊर्जा में भी बदला जा सकता है, जिससे लगातार बढ़ते ऊर्जा संकट को दूर किया जा सकता है।