मोदी सरकार की 'कूटनीति' से बौखलाने के बाद सीमा पर विवाद बढ़ा रहा है चीन
चीन की वामपंथी सरकार के मंसूबों को नाकामयाब करती मोदी सरकार
JUNE 11 (WTN) - चीन की वामपंथी सरकार अपने पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद के लिए कुख्यात है। जहां तक भारत की बात है, तो कई सालों से चीन भारत के साथ सीमा विवाद करता आया है। चीन की वामपंथी सरकार इतनी विस्तारवादी मानसिकता की है कि यदि भारत सरकार अपने सीमाई क्षेत्र में कोई भी निर्माण कार्य करे, तो उस पर भी चीन की वामपंथी सरकार को बिना वजह की परेशानी होती है।
ख़ैर, जैसा कि आप जानते ही हैं कि अभी हाल ही में चीन ने एक बार फिर से सीमा पर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन मोदी सरकार की कुशल कूटनीति के कारण ही चीन की सेना लद्दाख के गलवान, पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 और हॉट स्प्रिंग इलाके से करीब 2 किलोमीटर तक पीछे हट गई है। हालांकि, भारतीय सेना ने भी गतिरोध दूर करने के लिए अपने कदम पीछे किए हैं।
लेकिन इस सबके बीच, बड़ा सवाल यह है कि सीमा पर चीन भारत के खिलाफ अचानक इतना आक्रामक क्यों हो गया है? दरअसल, इसे चीन की आक्रामकता कहें या फिर बौखलाहट, इसके पीछे एक नहीं कई कारण हैं जिस वजह से चीन सीमा पर इस तरह के हथकंडे अपना रहा है।
सबसे पहले तो चीन जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने और पूरे इलाके को दो केंद्रशासित प्रदेश में विभाजित किए जाने के बाद से बौखलाया हुआ है। जम्मू कश्मीर पर मोदी सरकार के फैसले के बाद चीन ने इसे अस्वीकार्य बताते हुए कहा था कि पूरे इलाके की यथास्थिति से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। इतना ही नहीं, चीन ने इस पूरे मसले पर पाकिस्तान का हर स्तर पर साथ देने की भी पूरी कोशिश की।
बात करें कोरोना वायरस की, तो कोरोना वायरस संक्रमण पूरी दुनिया में फैलने के लिए अमेरिका समेत दुनिया के कई देश चीन की वामपंथी सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। इसी कारण से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों ने चीन के खिलाफ जांच की मांग की थी। इस पर भारत ने भी WHO (World Health Organization) में चीन के खिलाफ जांच का समर्थन किया था। दरअसल, चीन को ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकी ज़रा ज़्यादा ही परेशान कर रही है।
वहीं, इधर मोदी सरकार अपने सीमाई इलाकों में तेजी से मूलभूत ढांचे का विकास कर रही है। और इससे भी चीन बेचैन हुआ जा रहा है। दरअसल, युद्ध या संघर्ष होने पर भारतीय सेना के पास चीन की सीमा से लगे कई दुर्गम इलाकों तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं होता था। मोदी सरकार ने जब सीमाई इलाकों में सड़क निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ाया, तो चीन की वामपंथी सरकार यह सहन नहीं कर पाई।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2017 में डोकलाम में भारत-चीन के बीच टकराव के बाद से ही मोदी सरकार ने LAC के पास निर्माण कार्य तेज़ किए हैं। डोकलाम तनाव के बाद मोदी सरकार ने आर्मी को LAC के 100 किलोमीटर की परिधि के अंदर मूलभूत ढांचे के विकास के लिए पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी की बंदिश से मुक्त कर दिया था।
इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) को कई तरह के प्रशासनिक और आर्थिक फैसले लेने की शक्तियां बढ़ाईं हैं। चीन से सटी भारतीय सीमा पर मोदी सरकार ने 32,000 वर्कफोर्स वाले BRO के 67 प्रतिशत मजदूर तैनात किए हैं जिससे कि वहां पर लगातार निर्माण कार्य चालू रह सकें।
इधर चीन को आर्थिक तौर पर भी कुछ सबक सिखाने के लिए मोदी सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं। हाल ही मैं अप्रैल महीने में भारत ने चीन से होने वाले निवेश के ऑटोमैटिक रूट को बंद कर दिया है। और भारत में चीनी निवेश के पहले भारत सरकार की मंजूरी अनिवार्य कर दी है। दरअसल, कोरोना संकट के कारण कई भारतीय कंपनियों का कारोबार ठप हो गया है। ऐसे में इसका फायदा उठाकर चीनी कंपनियां इनका सस्ते में टेकओवर कर सकती थीं। इस पर चीन ने भारत के इस कदम को एकतरफा और WTO के नियमों के खिलाफ बताकर नाराजगी भी जताई थी।
बता दें कि चीन से फैले कोरोना वायरस संकट के बाद चीन से कई कंपनियां भारत शिफ्ट होना चाह रही हैं। और इसी बात को लेकर भी चीन परेशान है। स्वाभाविक है कि मोदी सरकार की कूटनीनिक और आर्थिक नीतियों से चीन की वामपंथी सरकार चिंता में पड़ गई है। यही कारण है कि LAC पर चीन की वामपंथी सरकार तनाव बड़ा रही है जिससे भारत को दवाब में लाया जा सके। लेकिन मोदी सरकार ने चीन के खिलाफ जो रणनीति अपनाई है वो उससे पीछे हटने वाली नहीं लगती है।