कोरोना वायरस की वैक्सीन की खोज में आई 'यह' सकारात्मक ख़बर
वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस संक्रमण की वैक्सीन जल्द मिलने की 'उम्मीद'
JULY 01 ( WTN) - मानव सभ्यता इस समय कोरोना वायरस संक्रमण महामारी के रूप में सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। चीन के वुहान शहर से उपजी और फैली कोरोना वायरस संक्रमण महामारी से इस लेख को लिखे जाने तक पूरी दुनिया में क़रीब 5 लाख 14 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, अभी तक इस महामारी से 1 करोड़ 5 लाख 91 हज़ार लोग संक्रमित हो चुके हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना वायरस संक्रमण महामारी को काफी पहले ही नियंत्रण में लिया जा सकता था। लेकिन चीन की वामपंथी सरकार की ग़लती, लापरवाही और ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैये के कारण यह महामारी पूरी दुनिया में फैल गई। ख़ैर, जैसा कि आप जानते ही हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी (COVID-19) की दवा और वैक्सीन बनाने के लिए पूरी दुनिया के वैज्ञानिक दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कोई भी ठोस सफलता हासिल नहीं हो सकी है।
इस सबके बीच, कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में जुटे वैज्ञानिकों की एक सबसे बड़ी चिंता यह रही है कि कोरोना वायरस बार-बार अपना रूप बदल रहा है यानि उसका म्यूटेशन हो रहा है। और काफी समय से वैज्ञानिक इस तथ्य के बारे में पता लगाने में लगे हैं कि कोरोना वायरस यानि SARS-CoV-2 में किस तरह का म्यूटेशन यानि आनुवांशिक बदलाव हो रहा है?
दरअसल, वैज्ञानिकों को इस बात की चिंता है कि कोरोना वायरस में लगातार होने वाले आनुवांशिक बदलाव से वैक्सीन प्रभावकारी नहीं रहेगी। लेकिन वैज्ञानिकों की तरफ से अब एक सकारात्मक बात सामने आई है। अपकी जानकारी के लिए बता दें कि npr.org में छपी रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस में लगातार अनुवांशिक बदलाव तो हो रहा है, लेकिन जांच से पता चला है कि यह बदलाव इतना ज़्यादा नहीं है कि वैक्सीन बेकार हो जाए।
इस बारे में स्विट्ज़रलैंड के बसेल यूनिवर्सिटी में महामारी मामलों की जानकार एम्मा हॉडक्रॉफ्ट का कहना है कि कोरोना वायरस में जो भी म्यूटेशन यानि आनुवंशिक बदलाव हो रहा है या जिस भी गति से यह हो रहा है, इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है।
वहीं, जॉन्स हॉपकिन्स अप्लाइड फिजिक्स लैब के वरिष्ठ वैज्ञानिक पीटर थीलेन के मुताबिक़, अभी तक कोरोना वायरस में बहुत कम म्यूटेशंस देखने को मिले हैं। और अभी तक जो भी म्यूटेशन हुए हैं, संभवत: उसका वायरस के काम करने के तरीके पर कोई असर नहीं होता है। इस समय कोरोना वायरस के क़रीब 47 हजार Genomes इंटरनेशनल डेटाबेस में स्टोर किए गए हैं। और Genomes पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि वायरस में किस प्रकार का और किस गति से बदलाव हो रहा है?
वरिष्ठ वैज्ञानिक पीटर थीलेन का कहना है कि जब भी दुनिया के किसी भी हिस्से से कोई भी वैज्ञानिक इंटरनेशनल डेटाबेस में नया Genomes डालते हैं, तो बाकायदा उसका अध्ययन किया जाता है। थीलेन के अनुसार, COVID -19 के आज जो भी वायरस फैल रहे हैं, वे चीन में मिले पहले वायरस की तरह ही हैं। इसलिए ही जनवरी महीने में COVID-19 के लिए जिस तरह की वैक्सीन तैयार की जाती, आज भी उसी तरह की वैक्सीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
वैज्ञानिकों को आशा है कि जल्द ही COVID-19 की कोई वैक्सीन मिल ही जाएगी। लेकिन वैज्ञानिकों को इस बात की भी चिंता है कि COVID-19 से बचाव के लिए क्या वैक्सीन एक बार देने भर से ही काम चल जाएगा, या फिर हर कुछ साल के बाद वैक्सीन को अपडेट करने की ज़रूरत पड़ सकती है? वैसे वैक्सीन की खोज में लगे वैज्ञानिकों के मुताबिक इस प्रश्न का उत्तर अभी पूरे विश्वास के साथ इस समय नहीं दिया जा सकता है क्योंकि SARS-CoV-2 अभी काफी नया है, और आने वाले समय में ही इस बात का पता चल सकेगा कि यह वायरस किस तरह का व्यवहार करेगा।