चीन और अमेरिका के बीच खिंची तलवारें!
चीन की 'दादागिरी' को अमेरिका से मिली 'चुनौती'
JULY 14 (WTN) - 21वीं सदी विकासवाद की सदी है। लेकिन चीन जैसे देश इस सदी में भी विकासवाद की जगह विस्तारवाद की नीति पर अमल कर रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत समेत कई अन्य पड़ोसी देशों के साथ चीन सालों से सीमा विवाद करता आया है। अभी हाल ही में चीन ने पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में LAC पर भारत के साथ सीमा विवाद किया था जिसके बाद दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प भी हुई थी।
दरअसल, विस्तारवादी मानसिकता वाली चीन की वामपंथी सरकार पड़ोसी देशों के साथ ही विवाद नहीं करती है बल्कि समुद्री सीमा से लगे देशों पर भी 'दादागिरी' दिखाने की पूरी कोशिशों में है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन काफी लम्बे समय से दक्षिण चीन सागर इलाके में अपना 'प्रभुत्व' जमाने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर में चीन का वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रुनेई, फिलीपींस और ताइवान के साथ विवाद है।
बता दें कि नाइन-डैश-लाइन नाम के इस इलाके पर चीन अपना दावा पेश करता रहा है। वहीं, अपने दावों को मज़बूत करने के लिए चीन इस क्षेत्र में कृत्रिम द्वीप तक बना रहा है। इतना ही नहीं, चीन ने पिछले कुछ दिनों में दक्षिण चीन सागर में अपनी नौसेना की मौजूदगी भी बढ़ा दी है, जिससे दक्षिण चीन सागर में तनाव और भी बढ़ गया है। चीन की इस विस्तारवादी हरकत से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया सतर्क और आक्रामक हो गए हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2009 में दक्षिण चीन सागर की नाइन डैश लाइन पर चीन ने अपने दावे का ऐलान किया था, लेकिन चीन ने उसके बाद से कोई भी कानूनी आधार पेश नहीं किया। बाद में 12 जुलाई 2016 को समुद्री संधि के 1982 कानून के तहत गठित ट्राइब्यूनल ने चीन के इस दावे को खारिज कर दिया था और ट्राइब्यूनल ने फिलीपींस के पक्ष में निर्णय दिया था।
इधर, दक्षिणी चीन सागर में चीन की बढ़ती हुई आक्रमकता से सचेत अमेरिका ने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वो दक्षिण चीन सागर के तमाम इलाकों पर चीन के दावे को खारिज करता है। बता दें कि ट्रम्प प्रशासन ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण चीन सागर में चीन के दावे का कोई भी क़ानूनी आधार नहीं है और चीन एकतरफा तरीके से अपनी मर्जी इस इलाके में नहीं थोप सकता है।
अमेरिका के रूख से साफ है कि वो दक्षिण चीन सागर में चीन को अपना समुद्री साम्राज्य नहीं बनाने देगा। वहीं हमेशा की तरह अमेरिका अपने दक्षिण-पूर्व एशिया के सहयोगी देशों के साथ एक बार फिर से खड़ा नज़र आ रहा है। साथ ही अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इन देशों की संप्रभुता और संसाधनों पर उनके अधिकारों की सुरक्षा करेगा।
स्पष्ट है कि अमेरिका दक्षिण चीन सागर या किसी भी दूसरे बड़े इलाके में शक्ति के दम पर चीन की कब्जे की हर कोशिश का विरोध कर रहा है और चीन के विस्तारवाद के दावों को खारिज़ कर रहा है। हालांकि, अमेरिकी रूख का चीन ने विरोध किया है। चीन का कहना है कि अमेरिका, दक्षिण चीन सागर इलाके की स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है जिससे चीन और अन्य देशों के बीच विवाद पैदा हो जाए।
लेकिन अमेरिका जैसी बड़ी सैन्य शक्ति चीन के विस्तारवाद का अच्छी तरह से मुक़ाबला करना जानती है। इसी कारण से अमेरिका ने साफ कर दिया है कि चीन ग़ैर क़ानूनी तरीके से समुद्री क्षेत्र में दावा नहीं कर सकता है, फिर वो चाहे स्कारबरो रीफ हो या स्पार्टली द्वीप में विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ)। इतना ही नहीं, अमेरिका ने स्पार्टली द्वीप में 12 नॉटिकल मील से ज़्यादा के समुद्री क्षेत्र पर चीन के दावे को खारिज कर दिया है। वहीं, चीन के समुद्री तट से 1000 नॉटिकल मील दूरी स्थित जेम्स शोल पर चीन के दावे को अमेरिका ने ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया है। लेकिन फिर भी दक्षिण चीन सागर में तमाम संसाधनों पर चीन अपना दावा कर रहा है। वहीं, इस इलाके पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए चीन इस इलाके के देशों को डराने-धमकाने का अभियान तक चला रहा है। जबकि अमेरिका और अन्य देश अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार इस समुद्री क्षेत्र से व्यापार जारी रखने के पक्ष में है।
दरअसल, चीन की इस इलाके में विस्तारवाद की यह नीति कोई आज की नीति नहीं है। इस इलाके में अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए चीन लंबे समय से योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा है। और इसी नीति के तहत चीन, आसियान देशों को बताता और जताता आया है कि चीन एक बड़ा देश है जबकि बाकी देश छोटे हैं। अब जबकि दक्षिण चीन सागर में चीन की ग़ैर क़ानूनी हरकतों का विरोध करने अमेरिका खुलकर सामने आ गया है, तो आने वाले समय में चीन और अमेरिका के बीच जारी 'शीत युद्ध' और भी गहरा सकता है।