सालों बाद 'इन कारणों' से बनी देश में ट्रेड सरप्लस की स्थिति
18 साल के बाद देश में आई ट्रेड सरप्लस की स्थिति
JULY 16 (WTN) - जैसा कि आप जानते ही हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण महामारी के कारण भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था काफी दिनों तक लगभग ठप सी रही। जहां तक भारत की बात है, तो लॉकडाउन के कारण भारत में क़रीब 100 दिनों तक कई सेक्टर्स की आर्थिक गतिविधियां बंद रहीं और इस कारण से न केवल देश को राजस्व का भारी नुकसान हुआ, बल्कि लाखों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इधर, IMF और World Bank जैसे वैश्विक आर्थिक संस्थानों ने भी साफ कहा है कि कोरोना संकट के कारण पूरी दुनिया को 1930 के दशक की आर्थिक मंदी की तरह बड़ी मंदी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, भारत की तेज़ी से विकास करती अर्थव्यवस्था पर भी कोरोना संकट का काफी विपरीत असर पड़ेगा। लेकिन कोरोना संकट की ऐतिहासिक आर्थिक परेशानियों और महाआर्थिक मंदी की तमाम आशंकाओं के बीच, भारत में 18 साल के बाद व्यापार में ट्रेड सरप्लस की स्थिति आई है।
अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर ट्रेड सरप्लस क्या होता है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें किसी भी देश के आयात और निर्यात के अंतर को व्यापार संतुलन कहा जाता है। जब कोई देश निर्यात की तुलना में आयात ज़्यादा करता है तो उसे Trade Deficit यानी व्यापार घाटा कहा जाता है। वहीं, जब कोई देश निर्यात की तुलना में आयात कम करता है, तो इसे Trade Surplus कहा जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के आयात में 47.59 प्रतिशत की बड़ी गिरावट के कारण 18 साल में पहली बार ट्रेड सरप्लस की स्थिति आई है। लेकिन वहीं तिलहन, कॉफी, चावल, तंबाकू, मसाला, औषधि और रसायन के निर्यात में वृद्धि दर्ज़ की गई है। हालांकि, लगातार चार महीनों; मार्च, अप्रैल, मई और जून में भारत के निर्यात में गिरावट दर्ज़ की गई है। जहां तक जून महीने की बात है, तो इस महीने देश के निर्यात में 12.41 प्रतिशत की गिरावट आई है। दरअसल, मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों, कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान और रत्न एवं आभूषण के निर्यात में गिरावट से देश का कुल निर्यात कम हुआ है।
कोरोना संकट के कारण कमज़ोर वैश्विक मांग से जून महीने में निर्यात 12.41 प्रतिशत घटकर 21.91 अरब डॉलर ही रहा। लेकिन जून के महीने में आयात भी 47.59 प्रतिशत घटकर 21.11 अरब डॉलर रहा। इसी कारण से जून महीने में क़रीब 0.79 अरब डॉलर के ट्रेड सरप्लस की स्थिति रही। बता दें कि पिछले 18 साल में यह पहला मौक़ा है जब ट्रेड सरप्लस की स्थिति देश में उत्पन्न हुई है। इससे पहले, जनवरी, 2002 में 10 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस हुआ था।
ट्रेड सरप्लस के बारे में कहा जा सकता है कि सरकार के निर्यात बढ़ाने के उपायों से देश से निर्यात में वृद्धि देखी जा रही है। वहीं, लॉकडाउन के बाद अब देश की आर्थिक गतिविधियां में धीरे-धीरे सुधर हो रहा है। साथ ही बड़ी तादात में कामगार अब काम की तरफ लौटने लगे हैं जिससे औद्योगिक गतिविधियां अब सामान्य हो रही हैं और इसी कारण से भारतीय उद्योग वैश्विक मांग को पूरा कर रहा है जिसके कारण कुछ सेक्टर्स में निर्यात बढ़ा है।
कम होते आयात और बढ़ते निर्यात के कारण अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि वस्तु व्यापार घाटा 2020-21 की पहली तिमाही में कम होकर 10 से 12 अरब डॉलर रहेगा जो कि 2019-20 की पहली तिमाही में करीब 46 अरब डॉलर था। वहीं, अनुमान है कि चालू खाते के मोर्चे पर 2020-21 की पहली तिमाही में करीब 14 से 16 अरब डॉलर का अधिशेष होगा।
18 साल बाद देश के व्यापार की ट्रेड सरप्लस की स्थिति उत्साहजनक है। लेकिन पिछले चार महीनों के दौरान पेट्रोल-डीज़ल समेत अन्य उत्पादों की मांग कमज़ोर रहने से आयात कम हुआ है। लेकिन वहीं, इस दौरान देश से हो रहे निर्यात में भी गिरावट दर्ज़ की गई है। अब जबकि कोरोना संकट के बाद पूरी दुनिया में आर्थिक गतिविधियां पटरी पर आएंगी, तो फिर देखना होगा कि मोदी सरकार की निर्यात संवर्धन नीतियों से निर्यात में कितनी वृद्धि होती है। वहीं, वोकल फॉर लोकल नीति से आयात पर कितना असर पड़ता है। और इन सबके कारण क्या ट्रेड सरप्लस की स्थिति कायम रह पाती है कि नहीं?