चीन की दादागिरी के ख़िलाफ़ 'एकजुट' हो रहीं विश्व शक्तियां
कई देशों के नागरिकों में बढ़ता जा रहा है चीन के ख़िलाफ़ गुस्सा
JULY 17 ( WTN) - 21वीं सदी विकासवाद की सदी है। दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश इस सदी में विकासवाद की राह पर चलकर अपने-अपने देश के लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने और आर्थिक प्रगति में लगे हुए हैं। लेकिन विकासवाद की इस सदी में वामपंथी तानाशाही व्यवस्था वाला देश चीन विस्तारवाद की नीति पर अमल करते हुए कई देशों के लिए सिर दर्द साबित होता जा रहा है।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि अभी कुछ दिनों पहले चीन ने LAC के पास पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी पर भारत के साथ सीमा विवाद खड़ा कर दिया था। वहीं, विवाद के कारण ही बाद में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प भी हुई थी। वैसे भारत ही नहीं, बल्कि चीन के अपने सभी सीमावर्ती पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद हैं। इतना ही नहीं, चीन, दक्षिण चीन सागर में स्थित कई द्वीपों पर अपना अधिकार जताता रहा है और इस इलाके से होने वाले समुद्री व्यापार को प्रभावित करने की कोशिश करता आया है जिस कारण से कई देशों के साथ उसका विवाद जारी है।
चीन की आक्रमक विस्तारवाद की नीति, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार का भारत ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों में भी विरोध होना शुरू हो गया है। बात करें ब्रिटेन की, तो जून 2020 में हुए एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि सर्वे में शामिल 49 प्रतिशत ब्रिटिश नागरिक 'कुछ चीनी सामानों' का बॉयकॉट करने के लिए तैयार थे। वहीं, सर्वे में शामिल दो तिहाई लोगों का मानना था कि चीनी सामानों के आयात पर शुल्क बढ़ा दिया जाना चाहिए। इसी बीच, देश में चीन विरोध की बढ़ती भावना के बाद, ब्रिटेन ने चीन को तगड़ा झटका देते हुए 5G नेटवर्क से चीनी कंपनी हुआवेई पर प्रतिबंध लगा दिया है।
बात करें दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति अमेरिका की, तो इसी साल मई महीने में वॉशिंग्टन में हुए एक सर्वे में शामिल 40 प्रतिशत लोगों ने 'मेड इन चाइना' प्रोडक्ट्स को नहीं खरीदने की मंशा ज़ाहिर की थी। दरअसल, अमेरिका में चीन विरोधी भावना के कई कारण हैं; जैसे कोरोना वायरस संक्रमण और ट्रेड वॉर। अमेरिका के लोगों को लगता है कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया में कोरोना वायरस संक्रमण महामारी चीन की वामपंथी सरकार की ग़लती और लापरवाही के कारण फैली है।
वहीं, ट्रेड वॉर के कारण चीन काफी लंबे समय से अमेरिका के निशाने पर है। और इसी कारण से पिछले साल अमेरिका ने चीन की हुआवेई और ZTE को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताकर ब्लैक लिस्ट किया था। इसके बाद अमेरिका ने चीन की सरकारी कंपनी चाइना मोबाइल को और इस साल चाइना टेलिकॉम को प्रतिबंधित कर दिया है।
इधर, दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी और कोरोना वायरस महामारी से नाराज़ होकर ऑस्ट्रेलिया में भी चीन के ख़िलाफ़ नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है। ऑस्ट्रेलिया में हुए एक सर्वे के अनुसार, सर्वे में शामिल 88 प्रतिशत ऑस्ट्रेलियाई लोगों को लगता है कि चीनी आयात पर ज़्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर स्वदेशी उत्पाद ज़्यादा से ज़्यादा ख़रीदने चाहिए। वहीं, चीन के झिनझियांग प्रान्त में मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं के बाद ऑस्ट्रेलिया की कई कंपनियों ने चीन से कपास का आयात पिछले साल ही बंद कर दिया था।
इधर, वियतनाम, ताइवान और फिलीपींस जैसे देशों में चीन की विस्तारवाद की आक्रमक नीति के ख़िलाफ़ काफी लंबे समय से आक्रोश है। और इन देशों में भी चीन में निर्मित सामानों का समय-समय पर बहिष्कार होता रहता है। लेकिन पूरी दुनिया में विरोध बढ़ने के बाद भी चीन की वामपंथी सरकार विस्तारवाद की नीति के ज़रिए पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद को जन्म देती रहती है। लेकिन दक्षिण चीन सागर में जिस तरह से चीन दादागिरी दिखा रहा है, उससे तो लगता है कि उसे अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के तगड़ा विरोध झेलना पड़ेगा।