...तो 'इन कारणों' से 2064 के बाद घटने लगेगी दुनिया की जनसंख्या
साल 2100 में अनुमान से 2 अरब कम रहेगी दुनिया की आबादी!
JULY 18 (WTN) - कई ग़रीब और विकासशील देशों की काफी सारी समस्याओं का एक ही बड़ा कारण है उन देशों की ज़रूरत से ज़्यादा जनसंख्या। जहां तक भारत की बात है, तो बेरोज़गारी समेत कई अन्य समस्याओं के लिए देश की विशाल जनसंख्या ही काफी हद तक ज़िम्मेदार है। हालांकि, भारत समेत कई देशों की सरकारें जनसंख्या नियंत्रण के लिए काफी प्रयास कर रही हैं। लेकिन इस दिशा में जब तक ठोस सफलता हासिल नहीं हो सकती जब तक कि जनता जागरूक नहीं हो।
लेकिन यदि हम आपसे कहें कि साल 2064 के बाद से दुनिया की जनसंख्या कम होने लगेगी, तो यह पढ़कर आप आश्चर्य में पड़ गए होंगे। पर आपको आश्चर्य करने की ज़रूरत नहीं है। दरअसल, एक नए शोध में दावा किया गया है कि साल 2064 के बाद से दुनिया की जनसंख्या कम होने लगेगी। वहीं, शोध में यह तक कहा गया है कि 22वीं सदी के आने तक दुनिया की जनसंख्या उम्मीद से दो अरब कम हो जाएगी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विश्व की जनसंख्या पर यह शोध वॉशिंगटन की स्कूल ऑफ़ मेडिसिन यूविर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक्स एंड अवैल्यूएशन (IHME) के शोधकर्ताओं ने किया है। इस शोध के अनुसार, आने वाले समय में जनसंख्या के बदलाव का असर दुनिया के शक्ति संतुलन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। द लेसेंट में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, इस साल मार्च में दुनिया की जनसंख्या 7.8 अरब थी लेकिन साल 2064 में यह सबसे अधिक 9.7 अरब तक पहुंचेगी।
लेकिन साल 2064 में दुनिया की सबसे ज़्यादा जनसंख्या होने के बाद एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा। दरअसल, गर्भनिरोधक साधनों के उपयोग में वृद्धि और लड़कियों के और भी ज़्यादा शिक्षित और जागरूक होने से प्रजनन की दर धीरे-धीरे कम होने लगेगी। और इसी कारण से 22वीं सदी के आने तक दुनिया की जनसंख्या उम्मीद से दो अरब कम हो जाएगी।
बता दें कि इस अध्ययन में नई पद्धति से मृत्युदर, प्रजनन क्षमता और प्रवासन का पूर्वानुमान लगाया और इसमें ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिसीज स्टडी 2017 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। और इस सबके आधार पर ही भविष्य की वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय जनसंख्या का अनुमान लगाया है।
इस शोध के अनुसार, साल 2100 तक 195 में से 183 देशें में कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम होगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुल प्रजनन दर एक महिला द्वारा उसके जीवन में पैदा किए बच्चों की औसत संख्या होती है। यानि कि आने वाले समय में महिलाओं के द्वारा कम बच्चे पैदा किए जाएंगे जिससे कई देशों की जनसंख्या कम होने लगेगी।
स्वाभाविक है कि जनसंख्या कम होने से बहुत से देशों को वर्क फ़ोर्स में कमी का सामना करना पड़ेगा। इतना ही नहीं, इसका काफी असर स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा। अब जबकि कुछ देशों की जनसंख्या में कमी आएगी, तो इसका व्यापक असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा। वहीं, जनसंख्या कम होने और इसका असर श्रमजीवी जनसंख्या पर पड़ने से कई देशों को अपनी प्रवासी नीतियों में उदारवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। क्योंकि श्रमजीवी जनसंख्या कम होने से कई देशों की GDP में बहुत फर्क पड़ेगा। और इस कारण से वैश्विक आर्थिक शक्तियों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
दरअसल, इस अध्ययन के पूरे अनुमान घटती हुई कुल प्रजनन दर (TFR) पर आधारित हैं। बता दें कि दुनिया की TFR साल 2017 में 2.37 थी। लेकिन साल 2100 में TFR घट कर केवल 1.66 रह जाएगी। यह बदलाव सामान्य प्रजनन दर 2.1 से काफी कम है जो एक जनसंख्या को कायम रखने के लिए होनी चाहिए। साफ है कि प्रजनन दर 2.1 से घटकर 1.7 होने से दुनिया के अधिकांश देशों की जनसंख्या कम होने लगेगी।
हालंकि, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के इलाके ही ऐसे होंगे जहां कि साल 2100 की जनसंख्या 2017 की जनसंख्या से ज़्यादा होगी। वहीं, एशिया और पूर्व और मध्य यूरोप की जनसंख्या में 25 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिल सकती है। लेकिन जहां तक भारत की बात है, तो भारत की जनसंख्या में केवल 25 प्रतिशत के आसपास ही कमी होगी। अब जबकि भारत समेत कई देश जनसंख्या के बोझ के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ रहे हैं, ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि साल 2100 तक भारत की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या पर काफी हद तक काबू पा लिया जाए।