...तो 'इन कारणों' से कुछ सरकारी बैंकों का होगा निजीकरण
आने वाले समय में देश में हो सकते हैं सिर्फ 5 से 6 सरकारी बैंक
JULY 21 (WTN) - यदि सभी कुछ सरकार की योजना और मंशा के अनुसार ही होता रहा, तो आने वाले समय में देश में राष्ट्रीयकृत सरकारी बैंकों की संख्या सिर्फ 5 ही रह सकती है। जी हां, दरअसल, केन्द्र सरकार देश के मौजूदा सरकारी बैंकों में से आधे से ज़्यादा का निजीकरण करने की योजना बना रही है। और यदि ऐसा होता है, तो कुछ समय के बाद देश में बस 5 राष्ट्रीयकृत सरकारी बैंक ही रह जाएंगे।
दरअसल, बैंकिंग इंडस्ट्री की हालत सुधारने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा निजीकरण का निर्णय लिया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, एक योजना के तहत सरकार पहले चरण में बैंक ऑफ़ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र और पंजाब एंड सिंध बैंक में मैजोरिटी स्टेक बेच सकती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ सरकारी समितियों और RBI (Reserve Bank of India) यानि भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकार को सुझाव दिया है कि देश में पांच से ज़्यादा सरकारी बैंक नहीं होने चाहिए। लेकिन अब चूंकि सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि अब और सरकारी बैंकों का आपस में विलय नहीं किया जाएगा। तो इन परिस्थितियों में सरकार के पास सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प शायद नहीं बचता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय देश में 12 सरकारी बैंक हैं और सरकार की मंशा है कि देश में सिर्फ 5 या 6 ही सरकारी बैंक रहें। आप यह भी जानते होंगे कि इसी साल सरकार ने 10 सरकारी बैंकों का विलय कर उन्हें 4 राष्ट्रीयकृत बैंकों में बदल दिया था। साल 2017 में देश में जहां 27 राष्ट्रीयकृत बैंक थे, वहीं अब देश में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 12 ही रह गई है।
दरअसल, कोरोनो वायरस ने देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है। लॉकडाउन और अन्य कारणों से देश की आर्थिक विकास की गति कम हुई है। ऐसे में केन्द्र सरकार नक़दी की बड़ी समस्या से जूझ रही है। वहीं, बैंकों का लगातार बढ़ता NPA भी केन्द्र सरकार के लिए सिरदर्द साबित होता जा रहा है। इन्हीं सब कारणों से सरकार नॉन-कोर कम्पनियों और सेक्टर्स में परिसंपत्तियों को बेचकर पूंजी जुटाने में मदद करने के लिए एक निजीकरण योजना पर काम कर रही है। और इसी के तहत, सरकार एक नए निजीकरण प्रस्ताव को तैयार कर रही है जिसे कैबिनेट के सामने मंज़ूरी के लिए पेश किया जाएगा।
हालांकि, सरकार की बैंकों की निजीकरण की योजना तब अमल में लाई जा सकती है, जब चालू वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान फंसे लोन की तादाद बढ़ सकती है। वैसे माना जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में विनिवेश होना फिलहाल सम्भव नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस समय आर्थिक प्रगति की गति सुस्त होने से बैंकों में विनिवेश से ज़्यादा बड़ा फायदा नहीं मिलने वाला है।
लेकिन अब चूंकि सरकार ने कुछ सरकारी बैंकों के निजीकरण की योजना बना ली है, तो कभी न कभी तो इस पर अमल होगा ही। लेकिन, यह भी तय है कि सरकार के इस क़दम का बैंक कर्मचारियों और विपक्ष द्वारा जमकर विरोध किया जाएगा।