जानिए क्यों हो रही है कोरोना वायरस की वैक्सीन बनने में देरी?
कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में फ़िलहाल बदलाव नहीं होने से वैज्ञानिकों को राहत
AUG 22 (WTN) - कोरोना वायरस संक्रमण महामारी इस समय मानव सभ्यता के अस्तित्व के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती है। इस महामारी की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस लेख को लिखे जाने तक, कोरोना वायरस संक्रमण महामारी से अभी तक क़रीब 8,03,551 लोगों की मौत हो चुकी है।
हालांकि, इस महामारी की वैक्सीन बनाने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। लेकिन, क्लीनिकल ट्रायल के सभी चरणों को सफलतापूर्वक पूरा करने वाली कोई भी प्रामाणिक वैक्सीन अभी तक नहीं बन सकी है। इधर, रूस ने ज़रूर दावा किया है कि उसके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की वैक्सीन बना ली है। लेकिन, रूस के इस दावे पर WHO समेत कई देश विश्वास ही नहीं कर रहे हैं।
दरअसल, कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिक इसलिए अभी तक सफल नहीं हो सके हैं क्योंकि कोरोना वायरस में लगातार म्यूटेशन देखा जा रहा है; इसलिए, अब यह आशंका हो रही है कि कहीं वायरस के रूप बदलने के कारण कोरोना वायरस की वैक्सीन बेकार न हो जाए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कोई भी वायरस ख़ुद को ज़्यादा लम्बे वक़्त तक प्रभावी रखने के लिए लगातार अपनी जेनेटिक संरचना में बदलाव लाता रहता है, जिससे इन्हें मारा न जा सके, और इसे ही वायरस का म्यूटेशन कहते हैं।
दरअसल, म्यूटेशन की यही प्रक्रिया वायरस को पहले से ज़्यादा ख़तरनाक बना देती है। वहीं, जब यह वायरस हमारे शरीर की किसी कोशिका पर हमला करते हैं, तो कोशिका कुछ ही समय में उसके जैसी हज़ारों संरचनाएं बना देती है और शरीर में वायरस लोड तेज़ी से बढ़ता है। यानी कोरोना वायरस का म्यूटेशन ही उसे और भी ज़्यादा ख़तरनाक बना रहा है। अब वैज्ञानिक लगातार इस बात पर शोध कर रहे हैं कि कोरोना वायरस का म्यूटेशन किस हद तक हो सकता है?
इधर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स (NIBMG) के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के जीन सीक्वेंस पर स्टडी के बाद एक पेपर प्रकाशित किया है। और, इस स्टडी के अनुसार, यूरोपियन यात्रियों के ज़रिए आए कोरोना वायरल स्ट्रेन सबसे ज़्यादा प्रभावी थे और पूरे देश में सबसे तेज़ी से फैले थे। जानकारी के अनुसार यह स्ट्रेन हेप्लोटाइप थे यानी एक ही ऑरिजिन से थे। वहीं, इनमें म्यूटेशन से बने वायरस के टाइप को D614G कहा जा रहा है।
दरअसल, कोरोना के D614G म्यूटेशन को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक परेशान हैं और इसका कारण है कि इसके म्यूटेशन से बने वायरस में वो नुकीली संरचना ज्यादा है जो उसे मानव शरीर में प्रवेश करने में मदद करती है। जैसा कि आप जानते ही हैं कि कोरोना वायरस एक तरह का प्रोटीन है, जिसकी संरचना नुकीली होती है। और कोरोना वायरस की यही नुकीली ज़्यादा घातक है। वैसे वैज्ञानिक इस कोशिश में जुटे हुए हैं कि किसी भी तरह से कोरोना वायरस और मानव शरीर में उपस्थित कोशिका की बॉन्डिंग को कमज़ोर किया जा सके।
इधर, वैसे तो कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में फिलहाल किसी भी तरह का कोई भी जीनोम बदलाव नहीं दिख रहा। लेकिन, यदि ऐसा होता है, तो कोरोना वायरस के लिए बन रही वैक्सीन के बेअसर होने का ख़तरा हो सकता है। वहीं, अगर म्यूटेशन से स्पाइक प्रोटीन में ही बदलाव हो तब भी वैक्सीन बेअसर हो सकती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ज़्यादातर वैक्सीन इसी स्पाइक प्रोटीन को टारगेट करते हुए तैयार हो रही हैं। लेकिन, अब चूंकि अभी तक स्पाइक प्रोटीन में बदलाव नहीं दिखा है, तो फ़िलहाल चिन्ता की बात नहीं है। ख़ैर, लेकिन अब देखना होगा कि इतने शोध के बाद कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिकों को कब तक सफलता हासिल होती है।