जानिए आख़िर क्यों चीन के राष्ट्रपति नहीं, बल्कि चीन के 'जनरल सेक्रेटरी' हैं शी जिनपिंग?
अमेरिका ने शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति मानने से किया 'इनकार'!
AUG 24 (WTN) - कोरोना वायरस संक्रमण महामारी के कारण चीन इस समय पूरी दुनिया के निशाने पर है। आरोप है कि चीन के 'जनरल सेक्रेटरी' शी जिनपिंग ने इस महामारी को रोकने में ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैया अपनाया, जिससे यह महामारी वुहान शहर से पूरी दुनिया में फैल गई। दरअसल, आप ज़रूर चौक गए होंगे कि हमने शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति नहीं, बल्कि चीन का जनरल सेक्रेटरी लिखा है। लेकिन, आप तब और भी ज़्यादा चौक जाएंगे जब हम आपसे कहेंगे कि शी जिनपिंग अधिकृत रूप से चीन के चुने हुए राष्ट्रपति नहीं हैं!
दरअसल, क्या है यह पूरा मामला? आइए आपको विस्तार से इसके बारे में बताते हैं। सबसे पहले तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कोरोना वायरस महामारी, साउथ चाइना सी में चीन की दादागिरी और काफी समय से चले आ रहे ट्रेड वॉर के कारण अमेरिका और चीन के बीच युद्ध तक की नौबत आ चुकी है। वहीं, दोनों देशों के बीच संबंध इतने बिगड़ चुके हैं कि अमेरिका ने अब शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति मानने और कहने से ही इनकार कर दिया।
बता दें कि शी जिनपिंग के प्रति अमेरिका में इतनी नाराज़गी और गुस्सा है कि अमेरिका में बाकायदा एक अधिनियम लाया गया है। इस अधिनियम के अधीन जल्द ही अमेरिकी दस्तावेज़ों में शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति नहीं लिखा जाएगा। दरअसल, शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति नहीं मानने के पीछे कुछ तर्क दिए हैं। इन्हीं तर्कों के आधार पर अमेरिका, शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति नहीं मानने की बात कह रहा है।
दरअसल, अमेरिका का तर्क है कि शी जिनपिंग के पास इस समय तीन उपाधियां हैं, लेकिन शी जिनपिंग के पास राष्ट्रपति पद की उपाधि नहीं है। इसी आधार पर, शी जिनपिंग इस समय चीन के जनरल सेक्रेटरी हैं और उन्हें यही कहा जाए ना कि चीन का राष्ट्रपति कहा जाए। हालांकि, अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो, शी जिनपिंग को लगातार प्रेसिडेंट शी जिनपिंग कहते रहे हैं। लेकिन अब, अमेरिका और चीन के बीच परिस्थितियों में बदलाव हो गया है, और माइक पोम्पियो अपने ट्वीट में शी जिनपिंग को जनरल सेक्रेटरी ऑफ़ चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) कह रहे हैं।
स्पष्ट है कि अमेरिका, शी जिनपिंग की नीतियों के कारण उनसे नाराज़ है और उन पर भड़का हुआ है। इसी कारण से अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के सांसद स्कॉट पेरी ने एक अधिनियम की पहल की। इस अधिनियम के तहत अब शी जिनपिंग को चीन के राष्ट्रपति की बजाए जनरल सेक्रेटरी ऑफ़ चाइना लिखा जाएगा। दरअसल, सांसद पेरी का तर्क है कि चूंकि शी जिनपिंग को चीन की जनता से लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना है; इसलिए, शी जिनपिंग, चीन के राष्ट्रपति नहीं हैं।
हालांकि, अमेरिका के तर्क में काफी दम है। ऐसा इसलिए, क्योंकि शी जिनपिंग के पास इस समय तीन उपाधियां हैं। इनमें से पद स्टेट चेयरमैन का है, तो दूसरा पद केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष का है। वहीं, शी जिनपिंग के पास तीसरी उपाधि कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव की है। बता दें कि इनमें में से कोई भी उपाधि चीन के राष्ट्रपति के समकक्ष नहीं है। इतना ही नहीं, चीन का मीडिया ख़ुद शी जिनपिंग को कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के नाम से संबोधित करता है ना कि राष्ट्रपति।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन का सुप्रीम लीडर, सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस हर पांच सालों में चुनती है, और यही लीडर, चायना कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव होता है जो कि चीन का राष्ट्रपति बनता है, लेकिन इसे चीन की जनता लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुनती है। साल 2012 में जब शी जिनपिंग सत्ता में आए थे, तो तब से ही उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत में काफी वृद्धि की है, और ख़ुद को माओ के बराबर शक्तिशाली कर लिया है।
दरअसल, शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति कहने से लेकर अब उन्हें जनरल सेक्रेटरी कहना, यह अमेरिका की कूटनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दरअसल, राष्ट्रपति से जनरल सेक्रेटरी की शिफ्टिंग के मायने यह हैं कि अमेरिका, चीन को बता देना चाहता है कि जनता के चुने प्रतिनिधि और तानाशाही में अंतर होता है। लेकिन, इस सब के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अभी तक एक भी बार शी जिनपिंग को चीन का जनरल सेकेटरी नहीं कहा है। हालांकि, अब ट्रम्प ने जिनपिंग को दोस्त कहना बन्द कर दिया है, और ट्रम्प ने यह भी स्पष्ट कहा दिया है कि उनकी उनके चाइनीज काउंटरपार्ट से मिलने में कोई भी दिलचस्पी नहीं है।
इधर, US-China Economic and Security Review Commission (USCC) ने स्पष्ट कर दिया है कि आगे से शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति नहीं, बल्कि जनरल सेक्रेटरी कहा जाएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि चीन के शीर्ष नेता को राष्ट्रपति के रूप में संबोधित करने से यह धारणा बनती है और संदेश जाता है कि चीन के लोगों ने उसे लोकतांत्रिक तरीके से चुना है। दरअसल, अमेरिका अपनी इस कूटनीति के तहत यह साबित करना चाहता है कि वो (अमेरिका) चीनी लोगों के साथ है, और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने उनके (चीनी नागरिकों) लोकतांत्रिक अधिकारों पर कब्ज़ा कर लिया है।