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जानिए क्यों सउदी अरब ने चीन को दिया झटका?

Thursday - August 27, 2020 6:02 pm , Category : WTN HINDI
सऊदी अरब ने चीन के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से ख़ुद को किया अलग
सऊदी अरब ने चीन के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से ख़ुद को किया अलग

पाकिस्तान के कारण आ सकती है चीन और सउदी अरब के सम्बन्धों में दरार


AUG 27 (WTN) - जैसा कि आप जानते ही हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण महामारी इस समय मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। चीन के वुहान शहर से फैली कोरोना वायरस संक्रमण महामारी से सभी देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो चुकी है। वहीं, लॉकडाउन के कारण उद्योग धंधे और ऑफिस आदि बंद होने से सामान्य जनजीवन भी काफी प्रभावित हुआ है। इधर, इन सभी कारणों से पूरी दुनिया में पेट्रोल और डीज़ल की खपत में भारी गिरावट देखी गई है, जिसके कारण तेल आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

साफ है कि कोरोना वायरस के कारण तेल आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है और इस नुकसान के लिए यह देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन को ज़िम्मेदार मान रहे हैं। हालांकि, यह देश किसी न किसी तरीके से चीन को सबक़ सिखाना चाहते होंगे। लेकिन, चीन की आर्थिक और सामरिक क्षमता के आगे कुछ देश चुप्पी साधे बैठे हैं और मौक़े का इंतज़ार कर रहे हैं।

लेकिन, आर्थिक रूप से काफी सम्पन्न सऊदी अरब ने फ़िलहाल चीन को एक तगड़ा झटका दिया है। दरअसल, सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको ने रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स बनाने को लेकर चीन के साथ हुए 10 अरब डॉलर के एक समझौते से ख़ुद को अलग कर लिया है।

दरअसल, सऊदी अरब द्वारा चीन के ख़िलाफ़ उठाए गए इस क़दम को काफी बड़ा क़दम माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना संकट के पहले चीन और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक रिश्ते काफी अच्छे थे। इन दोनों ही देशों के बीच नज़दीकियां इतनी ज़्यादा बढ़ गईं थीं कि चीन में उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार पर सऊदी अरब ने चुप्पी साध ली थी और इसे चीन का अंदरूनी मामला कहकर इस मामले में कुछ भी हस्तक्षेप करने और बोलने तक से इनकार कर दिया था, जबकि सऊदी अरब में मुस्लिमों के दो तीर्थ स्थल हैं।

लेकिन, कोरोना संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की खपत और मांग में कमी आई और इसी कारण से तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट देखी गई। और इसी कारण से दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको ने चीन के साथ हुए 10 अरब डॉलर के एक क़रार से ख़ुद को हटा लिया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अरामको ने चीन के पूर्वोत्तर प्रांत लिओनिंग में निवेश बंद करने का बड़ा निर्णय लिया है।

लेकिन, चीन के साथ इस बड़े क़रार से ख़ुद को पीछे खींचने के पीछे सिर्फ़ तेल ही एकमात्र कारण है, ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा होता, तो सऊदी अरब भारत के साथ हुए कुछ इसी तरह के क़रार को भी रद्द करता। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अरामको ने महाराष्ट्र में प्रस्तावित 44 अरब डॉलर के रत्‍नागिरी मेगा रिफाइनरी प्रोजेक्ट में निवेश का ऐलान किया था। लेकिन, अरामको ने स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी ने भारत में अपनी निवेश योजना में फ़िलहाल कोई बदलाव नहीं किया है। वहीं, इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ 15 अरब डॉलर का सौदा भी शामिल है जिसे जारी रखा जाएगा।

साफ है कि तेल की मांग में कमी और तेल के दामों में गिरावट के बाद भी सउदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको ने भारत के रिफायनरी प्रोजेक्ट में तो रुचि दिखाई है लेकिन चीन के प्रोजेक्ट से ख़ुद को अलग कर लिया। दरअसल, इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला और बड़ा कारण है कोरोना वायरस संक्रमण। क्योंकि लगता है कि सऊदी अरब को इस बात का आभास हो गया है कि चीन की वामपंथी सरकार की ग़लती, लापरवाही और ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैये के कारण ही कोरोना वायरस संक्रमण फैला है।

वहीं, हो सकता है कि चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकियों से नाराज़ होकर भी सउदी अरब ने यह क़दम उठाया हो। दरअसल, कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब का साथ नहीं मिलने के कारण पाकिस्तान इन दिनों सऊदी अरब के साथ तल्ख़ लहज़े में बात कर रहा है। वहीं, कश्मीर मुद्दे पर तुर्की का साथ मिलने के बाद पाकिस्तान इन दिनों तुर्की के गुणगान करने में लगा है। लेकिन, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मुस्लिमों के बीच अपना वर्चस्व साबित करने के लिए सउदी अरब और तुर्की के बीच होड़ लगी रहती है।

अब जबकि पाकिस्तान, तुर्की के साथ संबंधों को बढ़ा रहा है, तो ऐसे में पाकिस्तान को सबक़ सिखाने के लिए सऊदी अरब ने पाकिस्तान से एक पुराने क़र्ज़ को चुकाने के लिए एक अरब डॉलर मांग लिए थे। लेकिन, पाकिस्तान ने चीन से एक अरब डॉलर की मदद लेकर सऊदी अरब के क़र्ज़ को चुका दिया। अब जबकि सऊदी अरब, पाकिस्तान को ज़लील करना चाहता था, लेकिन चीन ने पाकिस्तान की सहायता कर ऐसा नहीं होने दिया। ऐसे में हो सकता है कि चीन की इस मदद से नाराज़ होकर सऊदी अरब ने चीन के प्रोजेक्ट से ख़ुद को अलग कर लिया हो। ख़ैर, तो इस आधार पर कहा जा सकता है कि चीन के प्रोजेक्ट से सऊदी अरब ने ख़ुद को एक नही, बल्कि कई कारणों से अलग किया है।